किंशासा। मध्य अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला का मौजूदा प्रकोप अब तक का सबसे खतरनाक रूप ले चुका है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में अब तक 4,381 संक्रमित मरीजों की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें से 2,011 लोगों की मौत हो गई है। फिलहाल 704 मरीज अलग-अलग अस्पतालों और आइसोलेशन वार्डों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं।

तीन हफ्तों में दोगुनी हो गईं मौतें

इस महामारी की रफ्तार का अंदाजा इसी से लग जाता है कि शुरुआती एक हजार मौतें आने में करीब नौ हफ्ते लगे थे, जबकि अगले महज तीन हफ्तों के भीतर ही दूसरी एक हजार मौतें दर्ज कर ली गईं। स्वास्थ्यकर्मियों और राहत एजेंसियों का कहना है कि दूरदराज और बेहद दुर्गम इलाकों तक समय रहते दवाइयां और चिकित्सा सहायता नहीं पहुंच पा रही है, जिसके चलते मरने वालों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है।

वैक्सीन नहीं, इलाज नहीं—यही सबसे बड़ी मुश्किल

इस बार फैला इबोला का बुंडीबुग्यो वायरस पिछले प्रकोपों से बिल्कुल अलग और ज्यादा खतरनाक है। साल 2014-16 और 2018 में फैले जायर इबोला वायरस के लिए अब तक कारगर वैक्सीन और इलाज मौजूद हैं, लेकिन मौजूदा लहर के लिए जिम्मेदार बुंडीबुग्यो वायरस की न तो कोई स्वीकृत वैक्सीन है और न ही कोई सटीक इलाज। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, यह बीमारी मई में औपचारिक घोषणा से पहले ही फरवरी से कांगो के सबसे दूरस्थ और असुरक्षित इलाकों में चुपचाप फैलनी शुरू हो गई थी।

1976 के बाद देश का सबसे बड़ा प्रकोप

गौरतलब है कि इबोला वायरस की पहचान पहली बार 1976 में कांगो की ही इबोला नदी के पास हुई थी। तब से लेकर अब तक देश में यह 17वां और सबसे बड़ा प्रकोप बन चुका है। डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स और WHO की टीमें जमीनी स्तर पर मरीजों को बचाने और संक्रमण की चेन तोड़ने में जुटी हैं, लेकिन इलाके की अस्थिरता और मंजूरशुदा वैक्सीन के अभाव में यह महामारी लगातार विकराल रूप लेती जा रही है।

Hamirpur में स्कूली बच्चों का हंगामा, सड़क की मांग को लेकर DM ऑफिस पहुंचे छात्र

शेयर करना
Exit mobile version