नई दिल्ली। पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, चिप्स और कोल्ड ड्रिंक्स, ये नाम सुनते ही बच्चों की आँखें चमक उठती हैं। लेकिन यही चमक धीरे-धीरे उनकी सेहत पर कालिख पोत रही है। वैज्ञानिक शोधों ने आगाह किया है कि जंक फूड सिर्फ शरीर का वज़न नहीं बढ़ाता, बल्कि बच्चों के मानसिक विकास, हार्मोनल संतुलन और पूरी जीवनशैली को बुरी तरह प्रभावित करता है।

पेट तो भरता है, पोषण नहीं देता

दिक्कत की जड़ इन खाद्य पदार्थों की बनावट में छिपी है। इनमें कैलोरी, चीनी, नमक और ट्रांस फैट भरपूर होता है, जबकि प्रोटीन, विटामिन, फाइबर और खनिज तत्व गायब रहते हैं। नतीजा यह होता है कि बच्चे का पेट भर जाने के बावजूद शरीर पोषण के लिए तरसता रहता है।

डायबिटीज और दिल की बीमारियों की नींव बचपन में

मैक्स हेल्थकेयर, नई दिल्ली की चीफ डायबिटीज एजुकेटर डॉ. शुभदा भनोत के अनुसार, बचपन में जंक फूड की लत सबसे पहले मोटापे को जन्म देती है। जब बच्चे ज़रूरत से ज़्यादा कैलोरी लेते हैं और शारीरिक मेहनत नहीं करते, तो शरीर में चर्बी जमा होने लगती है। बचपन का यह मोटापा आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और दिल की बीमारियों की वजह बन सकता है।

दिमाग पर भी पड़ता है असर

जंक फूड का असर सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं है। अध्ययनों में पाया गया है कि ज़्यादा प्रोसेस्ड खाना खाने वाले बच्चों में ध्यान लगाने की क्षमता कमज़ोर पड़ जाती है। ऐसे बच्चों में चिड़चिड़ापन, मूड स्विंग, बेवजह की थकान और एकाग्रता की गंभीर कमी देखी जा रही है। कुछ शोध तो बच्चों में बढ़ रही चिंता और अवसाद की वजह भी खराब खानपान को ही बता रहे हैं।

ज़ायका बिगाड़ रहा पूरी ज़िंदगी की आदत

लगातार ज़्यादा नमक, चीनी और फैट वाला खाना खाने से बच्चों की स्वाद-पसंद बदल जाती है। वे फल, सब्ज़ी, दाल और दूध जैसी पौष्टिक चीज़ों से दूर भागने लगते हैं। इससे शरीर में आयरन, कैल्शियम और विटामिन डी जैसे ज़रूरी तत्वों की भारी कमी हो जाती है, जिसका सीधा असर उनकी लंबाई, हड्डियों और दिमागी विकास पर पड़ता है। बचपन की यह आदत अक्सर पूरी ज़िंदगी का रोग बन जाती है।

किशोरियों के लिए बड़ा ख़तरा

डॉक्टरों ने खासतौर पर किशोर लड़कियों के लिए चेतावनी दी है। जंक फूड में मौजूद अत्यधिक चीनी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ाते हैं, जो पीसीओएस (PCOS) जैसे जटिल हार्मोनल विकार को जन्म दे सकता है। इससे पीरियड्स अनियमित होना, वज़न बढ़ना, चेहरे पर अनचाहे बाल आना और भविष्य में प्रजनन संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं।

सिर्फ मनाही नहीं, समझदारी चाहिए

विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या से लड़ने के लिए सिर्फ बच्चों को डाँटना काफी नहीं। माता-पिता, स्कूल और समाज को मिलकर बच्चों को संतुलित आहार की अहमियत समझानी होगी। कोल्ड ड्रिंक की जगह नींबू पानी, छाछ और नारियल पानी और चिप्स की जगह मेवे-फल जैसे विकल्प घर में रखने की आदत डालनी होगी। साथ ही बच्चों का स्क्रीन टाइम घटाकर उन्हें खेल के मैदान तक ले जाना भी उतना ही ज़रूरी है।

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