उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) ने विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस के अवसर पर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर रोशनी डाली है। KGMU के डॉ. सूर्यकान्त ने कहा है कि फेफड़ों के कैंसर के इलाज के दौरान मरीज के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है। बीमारी का बोझ और तनाव मरीजों की रिकवरी को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
अध्ययन में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
KGMU द्वारा फेफड़े के कैंसर के 90 मरीजों पर किए गए एक विशेष अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इस शोध के अनुसार, अध्ययन में शामिल 55.56% मरीजों में मध्यम चिंता (Moderate Anxiety) और 26.67% मरीजों में मध्यम अवसाद (Moderate Depression) के लक्षण पाए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक उम्र, धूम्रपान की आदत और कैंसर की बढ़ी हुई स्टेज (Advanced Stage) की वजह से मरीजों में मानसिक समस्याओं का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है।
नियमित मानसिक स्वास्थ्य जांच की सिफारिश
शोध के निष्कर्षों को देखते हुए चिकित्सा विशेषज्ञों ने सिफारिश की है कि प्रत्येक फेफड़ा कैंसर रोगी की नियमित रूप से मानसिक स्वास्थ्य की जांच होनी चाहिए। समय पर सही काउंसलिंग और चिकित्सकीय उपचार मिलने से मरीजों की जीवन गुणवत्ता (Quality of Life) में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है।
देश में फेफड़े के कैंसर के हालात और जोखिम कारक
आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल फेफड़े कैंसर के करीब 1 लाख नए मरीज सामने आते हैं, जिनमें से लगभग 85 हजार लोगों की इस खतरनाक बीमारी से मौत हो जाती है। डॉक्टरों के अनुसार धूम्रपान, बढ़ता वायु प्रदूषण, फैक्टरियों का धुआं और लकड़ी के चूल्हे का धुआं इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं। इस वर्ष विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस की थीम ‘फेफड़ों के कैंसर का सामना साथ मिलकर’ रखी गई है, जिसके जरिए समाज में जागरूकता बढ़ाने की अपील की गई है।



