नई दिल्ली। रात की नींद पूरी न होने पर कुछ लोगों की याददाश्त और दिमाग पर ज्यादा असर पड़ता है, जबकि कुछ लोग इससे कम प्रभावित होते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है? वैज्ञानिकों ने इस सवाल का जवाब ढूंढ निकाला है। एक नई रिसर्च के मुताबिक, दिमाग की रातभर चलने वाली सफाई व्यवस्था में शामिल एक खास जीन यह तय करता है कि खराब नींद अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी के खतरे को कितना बढ़ाएगी।
दिमाग की सफाई का पूरा सिस्टम
एडिथ कोवन यूनिवर्सिटी (ECU) के सेंटर फॉर प्रिसिजन हेल्थ की इस स्टडी में एक्वापोरिन-4 (AQP4) नाम के जीन की जांच की गई। यह जीन दिमाग में पानी की आवाजाही को नियंत्रित करता है, जो हमारे दिमाग की प्राकृतिक कचरा साफ करने की प्रणाली को चलाने में मदद करता है। यह सफाई प्रक्रिया खासतौर पर रात में नींद के दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय होती है और अल्जाइमर जैसी बीमारी से जुड़े नुकसानदायक प्रोटीन को बाहर निकालने का काम करती है।
जीन के हिसाब से अलग-अलग असर
शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों में AQP4 जीन के कुछ खास प्रकार थे, उनमें कम नींद लेने पर ग्रे मैटर यानी दिमाग के सोचने-समझने, याददाश्त और फैसले लेने वाले हिस्से की मात्रा तेजी से घटने लगी। रिसर्चर डॉ. आयशा मिलिगन आर्मस्ट्रांग ने कहा, यह सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आपमें कौन से जीन हैं, बल्कि यह मायने रखता है कि वे जीन आपकी जीवनशैली के साथ कैसे तालमेल बिठाते हैं। एक ही जीन आपकी नींद की आदतों के हिसाब से या तो आपको बचा सकता है या फिर नुकसान पहुंचा सकता है। यह इसलिए अहम है क्योंकि नींद उन चंद चीजों में से एक है जिसे हम सच में बदल सकते हैं।
हर किसी के लिए अलग होगा इलाज
वैज्ञानिकों ने 13 आम AQP4 जीन प्रकारों का विश्लेषण किया और साथ ही लोगों की नींद की आदतों, ब्रेन स्कैन और मानसिक परीक्षणों के नतीजों को भी परखा। उन्होंने पाया कि कुछ लोगों में कम घंटे सोने का सीधा संबंध दिमाग के सिकुड़ने से था, जबकि दूसरों में सोने में ज्यादा समय लगना दिमागी संरचना में बदलाव की वजह बना। डॉ. टेनिएल पोर्टर ने कहा, इससे साफ है कि अल्जाइमर से बचाव के लिए अब सबके लिए एक जैसे तरीके की बजाय हर व्यक्ति के हिसाब से अलग रणनीति अपनाने की जरूरत होगी।
आगे क्या करना चाहते हैं वैज्ञानिक?
शोधकर्ताओं ने कहा कि अभी वे जेनेटिक टेस्टिंग की सलाह देने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन वे ऐसे क्लिनिकल ट्रायल चाहते हैं जिनमें जेनेटिक जानकारी को शामिल करके यह जांचा जा सके कि नींद की आदतों में सुधार करके क्या विरासत में मिली इस कमजोरी को कम किया जा सकता है। CPH के डायरेक्टर प्रोफेसर साइमन लॉज़ ने कहा, यह पहचानना कि कौन सबसे ज्यादा कमजोर है और किसे जीवनशैली में बदलाव से सबसे ज्यादा फायदा होगा—यही सटीक स्वास्थ्य सेवा की असली जरूरत है, न कि हर अल्जाइमर जोखिम वाले व्यक्ति के साथ एक जैसा व्यवहार करना।



