प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस की कार्यप्रणाली और वहां के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर (वर्तमान आईजी प्रयागराज) अजय मिश्रा को लेकर बेहद तल्ख और गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने पुलिस द्वारा जमीन के एक दीवानी विवाद (Civil Dispute) को जबरन ‘गैंगस्टर एक्ट’ में बदलने की साजिश का पर्दाफाश किया है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ी नाराजगी जताते हुए आरोपी राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार के खिलाफ चल रही गैंगस्टर एक्ट की पूरी कार्यवाही को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है।

पुलिस के ‘अधूरे ज्ञान’ की कीमत एक निर्दोष महिला ने चुकाई

सुनवाई के दौरान माननीय अदालत ने गाजियाबाद पुलिस के रवैए को आड़े हाथों लिया। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि गाजियाबाद पुलिस की लचर कार्यप्रणाली और अधूरे ज्ञान का सीधा फायदा आरोपियों को मिला।

कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: पुलिस के इस ‘अधूरे ज्ञान’ और तानाशाही रवैए की कीमत एक निर्दोष ३५ वर्षीय महिला (ललिता त्यागी) को चुकानी पड़ी, जिसे बिना किसी ठोस वजह के 80 दिनों तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ‘स्मार्ट पुलिसिंग’ के नाम पर आखिर यह कैसा अंधेर है?

तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय मिश्रा को कड़ी फटकार

हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय मिश्रा की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने स्पष्ट किया कि कमिश्नर ने बिना किसी सबूत की जांच किए और बिना स्वतंत्र रूप से अपना दिमाग लगाए (Without application of mind) गैंग चार्ट को अपनी मंजूरी दे दी थी। यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की सरेआम धज्जियां उड़ाने जैसा है।

सुनवाई के दौरान पूर्व कमिश्नर पर लगे आरोपों का जिक्र करते हुए (पैरा 75) में कहा गया कि:

  • उनका रवैया पूरी तरह से मनमाना, तानाशाही भरा और प्रतिशोधी (Vindictive) था।
  • उन्होंने बिना सोचे-समझे इस मामले में काम किया।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी जोड़ा, “हम बिना ठोस सबूत किसी अफसर के व्यवहार या व्यक्तिगत गुणों पर सीधी टिप्पणी नहीं करेंगे। यह उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग (Home Dept) का काम है कि वह फील्ड पोस्टिंग के लिए ऐसे अफसरों की ‘योग्यता और कार्यक्षमता’ का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करे।”

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