सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद की एक शिक्षिका की याचिका पर सुनवाई करते हुए अंतर-जिला (इंटर-डिस्ट्रिक्ट) ट्रांसफर को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि परिवार से दूर रहना हर नौकरीपेशा व्यक्ति या कर्मचारी के सामने आने वाली एक सार्वभौमिक (सामान्य) समस्या है। केवल इस आधार पर कोई भी शिक्षक या कर्मचारी कानूनी अधिकार के रूप में इंटर-डिस्ट्रिक्ट ट्रांसफर का दावा नहीं कर सकता।

बता दें, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा जारी अवमानना आदेश को रद्द कर दिया और अवमानना याचिका को भी समाप्त कर दिया। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि ट्रांसफर नीतियों का पालन विभागीय नियमों और छात्रों के हितों के अनुसार ही होना चाहिए।

फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हर शिक्षक को यह हमेशा याद रखना चाहिए कि देश की शिक्षा व्यवस्था मुख्य रूप से विद्यार्थियों के हित और उनकी पढ़ाई के लिए बनाई गई है। यह व्यवस्था शिक्षकों का व्यक्तिगत करियर आगे बढ़ाने या उन्हें सुविधाजनक तैनाती देने का जरिया नहीं है। शीर्ष अदालत के इस फैसले से बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों के ट्रांसफर मामलों की दिशा पूरी तरह स्पष्ट हो गई है।

'बागी विधायकों का टिकट और साहब का कुर्सी प्रेम' । पॉवर सेंटर WITH VIRENDRA SINGH ।

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