नई दिल्ली। गणेश उत्सव पूरे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस साल यह त्योहार 14 से 25 सितंबर तक मनाया जाएगा। बप्पा के स्वागत के लिए देशभर में जगह-जगह भव्य पंडाल बन रहे हैं, जहां गणपति की मूर्ति स्थापित की जाएगी। मुंबई के लालबागचा राजा तो दुनियाभर में मशहूर हैं, जहां दर्शन के लिए लाखों भक्तों की भीड़ उमड़ती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गणेशोत्सव की शुरुआत कैसे हुई? चलिए जानते हैं इस शानदार सफर के बारे में।
शिवाजी महाराज और पेशवाओं के काल से जुड़ी है परंपरा
गणपति पूजा की परंपरा नई नहीं है, इसकी जड़ें सदियों पुरानी हैं और यह मराठा साम्राज्य से जुड़ी हुई हैं। माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुणे में हिंदू संस्कृति और भक्ति भावना को बढ़ावा देने के लिए गणेश उत्सव की शुरुआत की थी। इसके बाद 18वीं सदी में पेशवाओं के शासनकाल में गणेश उत्सव को राजसी संरक्षण मिला और इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाने लगा। उस दौरान पुणे के शनिवार वाड़ा में भव्य गणेशोत्सव का आयोजन किया जाता था।
अंग्रेजों के शासन में सीमित हो गया उत्सव
अंग्रेजों के शासन में पेशवा साम्राज्य के पतन के बाद गणेश उत्सव से राजसी संरक्षण खत्म हो गया और यह त्योहार लोगों के घरों और व्यक्तिगत पूजा-पाठ तक सीमित रह गया। 19वीं सदी के मध्य में जब भारत ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठा रहा था, तब अंग्रेजों ने भारतीयों के एकजुट होने पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे, खासकर 1857 के विद्रोह के बाद। इस दौरान सांप्रदायिक तनाव भी काफी बढ़ गया था।
तिलक ने सार्वजनिक उत्सव से जगाई एकता की भावना
लोगों में एकता की भावना जगाने के लिए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में सार्वजनिक गणेश उत्सव मनाने की शुरुआत की। उनकी इस पहल ने लोगों को एक साथ इकट्ठा होने का मंच दिया। इस उत्सव ने लोगों को साथ मिलकर त्योहार मनाने, नाच-गाने और अपनी संस्कृति को बढ़ावा देने का मौका दिया। तिलक की यह कोशिश राष्ट्रभक्ति का केंद्र भी बनी और स्वतंत्रता संग्राम में लोगों को साथ लाने का काम किया।
आज के गणेशोत्सव का यही है आधार
गणेश उत्सव का जो रूप हम आज देखते हैं, उसका इतिहास काफी पुराना है। सार्वजनिक पंडालों में बप्पा की स्थापना करना और हर वर्ग के लोगों का समान रूप से शामिल होना तिलक की पहल का ही नतीजा है। 11 दिनों का यह त्योहार आज महाराष्ट्र के साथ-साथ पूरे देश में बहुत जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है।



