उत्तर भारत में मई के महीने में तीखी धूप होना सामान्य है, लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में स्थित बांदा जिले ने तपिश के पिछले सारे रिकॉर्ड्स को ध्वस्त कर दिया है। मई में सूर्य की सीधी किरणों के चलते पूरा शहर इस कदर तप रहा है कि दोपहर होते ही सड़कों पर कर्फ्यू जैसा सन्नाटा पसर जाता है और लोग घरों में कैद रहने को मजबूर हैं। पर्यावरणविदों के अनुसार, यह केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ लगातार की जा रही छेड़छाड़ का एक बेहद डरावना नतीजा है।
पूरी दुनिया और एशिया में टॉप पर पहुंचा तापमान
बांदा जिला इस समय न सिर्फ उत्तर प्रदेश में, बल्कि वैश्विक स्तर पर अत्यधिक गर्म इलाकों की लिस्ट में सबसे ऊपर आ गया है। इस पूरे महीने यहाँ का पारा लगातार 47 से 48 डिग्री सेल्सियस के इर्द-गिर्द बना रहा। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, बीते एक माह के दौरान यह शहर दो बार पूरे विश्व का और तीन बार एशिया महाद्वीप का सबसे गर्म स्थान दर्ज किया जा चुका है। चालू महीने में यहाँ का अधिकतम तापमान 47.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिसने पिछले 75 सालों का रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया। इससे भी बदतर हालात 19 मई को देखने को मिले थे, जब यहाँ का तापमान 48.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था।
बांदा में इस भीषण रिकॉर्डतोड़ गर्मी के मुख्य कारण:
थार रेगिस्तान से आ रही झुलसाने वाली हवाएं
मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के जानकारों का कहना है कि बांदा की इस रिकॉर्डतोड़ तपिश की सबसे पहली वजह भौगोलिक है। राजस्थान के थार मरुस्थल से उठने वाली बेहद शुष्क और गर्म पछुआ हवाएं तेज रफ़्तार से यूपी के दक्षिणी हिस्से और बुंदेलखंड की ओर बढ़ रही हैं। इनके रास्ते में कोई प्राकृतिक रुकावट न होने के कारण ये सीधे बांदा को अपनी चपेट में ले रही हैं। साथ ही, आसमान एकदम साफ होने की वजह से सूरज की किरणें सीधे धरती को झुलसा रही हैं।
बुंदेलखंड के पथरीले धरातल का असर
बांदा की भौगोलिक बनावट भी इसे अन्य मैदानी क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा गर्म बनाती है। समूचा बुंदेलखंड इलाका अपनी पथरीली जमीन और बड़ी चट्टानों के लिए जाना जाता है। ग्रेनाइट और भारी पत्थरों से निर्मित यह धरती दिन के समय सौर विकिरण को बहुत तेजी से सोखती है और अत्यधिक गर्म हो जाती है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यह पथरीली सतह रात के समय इस गर्मी को बहुत धीरे-धीरे वातावरण में छोड़ती है, जिससे यहाँ दिन के साथ-साथ रातें भी बेहद बेचैन करने वाली हो जाती हैं।
पश्चिमी विक्षोभ की बेरुखी से बिगड़े हालात
इस साल मौसम के बदले मिजाज ने बांदा की परेशानी को और बढ़ा दिया। मई की शुरुआत में सक्रिय हुए पश्चिमी विक्षोभ के कारण उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में हल्की वर्षा हुई थी, जिससे लोगों को धूप से राहत मिली। मगर बुंदेलखंड का यह क्षेत्र इस मौसमी बदलाव से पूरी तरह अछूता रह गया। यहाँ प्री-मानसून की एक बूंद भी नहीं पड़ी, जिसके चलते अप्रैल से इकट्ठा हो रही गर्मी लगातार बढ़ती गई और पूरा जिला भीषण हीटवेव की चपेट में आ गया।
हरियाली का नामोनिशान मिटना
पर्यावरण विशेषज्ञों ने सचेत किया है कि बांदा के इस तरह सुलगने की सबसे बड़ी और चिंताजनक वजह यहाँ का तेजी से घटता वन क्षेत्र है। वर्तमान में इस जिले में केवल 3% ग्रीन कवर (हरियाली) ही बचा है। यदि इसकी तुलना आस-पास के जिलों से करें, तो चित्रकूट में 18% और ललितपुर में 11.5% वन क्षेत्र है। पेड़ों की इस भारी किल्लत के कारण भूमिगत नमी पूरी तरह खत्म हो गई है। वनस्पति न होने से यहाँ ‘अल्बीडो इफेक्ट’ बढ़ गया है, जिससे धूप अवशोषित होने के बजाय वापस लौटकर वातावरण को और गर्म कर देती है।
केन नदी में अंधाधुंध अवैध खनन
बांदा की लाइफलाइन कही जाने वाली केन नदी आज इंसानी लालच की भेंट चढ़ रही है। नदी के तटों और आस-पास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अवैध बालू (मोरंग) निकाला जा रहा है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, यहाँ से रोजाना 2,000 से 3,000 ट्रक बालू अवैध तरीके से बाहर भेजी जा रही है। इस अत्यधिक दोहन से नदी का पानी अपने न्यूनतम स्तर पर आ गया है। बालू हटने से किनारों की प्राकृतिक वनस्पतियां नष्ट हो गई हैं, जिसने इस पूरे क्षेत्र के नेचुरल कूलिंग सिस्टम को पूरी तरह ठप कर दिया है।
सर्दियों के मौसम में सूखे की मार
इस साल मौसम की मार केवल गर्मियों में ही नहीं पड़ी, बल्कि इसकी शुरुआत सर्दियों से ही हो गई थी। दिसंबर से अप्रैल के बीच देश में बहुत कम पश्चिमी विक्षोभ एक्टिव हुए, जिससे सर्दियों और मार्च-अप्रैल में होने वाली पारंपरिक छिटपुट बारिश पूरी तरह गायब रही। आमतौर पर गर्मियों से ठीक पहले होने वाली यह हल्की बौछारें सूखी मिट्टी को भीतर तक ठंडा रखती हैं। इस बार ऐसा न होने से शुरुआती महीनों से ही ‘हीट-बिल्डअप’ (गर्मी का संचय) शुरू हो गया, जो मई आते-आते ज्वालामुखी की तरह भड़क उठा।
‘मैन-मेड हीट आइलैंड’ में तब्दील होता शहर
भूवैज्ञानिकों का साफ कहना है कि बांदा अब एक प्राकृतिक शहर न रहकर मानवीय गतिविधियों से बना ‘मैन-मेड हीट आइलैंड’ बन चुका है। पेड़ न होने से हवा में मॉइस्चर (नमी) नहीं है और इस कमी से जलस्रोत व नदियां तेजी से सूख रहे हैं। सूखी नदियां और अनियंत्रित बालू खनन मिलकर स्थानीय स्तर पर एक कृत्रिम ‘ग्रीनहाउस इफेक्ट’ बना रहे हैं। इसके साथ ही, जिले में दिन-रात चलने वाले स्टोन क्रशर उद्योग और भारी वाहनों के लगातार निकलते धुएं ने रात के समय भी तापमान को कम होने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा है।
एनजीटी (NGT) के दिशानिर्देशों की अनदेखी
बांदा की इस प्रशासनिक और पर्यावरणीय बदहाली को ठीक करने की कोशिशें भी सिर्फ फाइलों तक ही सीमित हैं। प्रशासन द्वारा जो नए पौधे रोपे जा रहे हैं, वे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के मानकों और स्थानीय जलवायु के हिसाब से सही नहीं हैं। सही देखभाल न होने और गलत प्रजाति के चयन के कारण ये पौधे भीषण गर्मी के पहले ही दौर में झुलसकर नष्ट हो जाते हैं। भूवैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि अवैध खनन पर तुरंत रोक नहीं लगी और जल संरक्षण के साथ बड़े पैमाने पर पौधारोपण नहीं हुआ, तो आने वाले सालों में बांदा इंसानों के रहने लायक नहीं बचेगा।



