Cancer Risk: डॉक्टरों ने पिछले कुछ सालों में एक बात पर खास ध्यान दिया है कि पहले कैंसर को बुढ़ापे की बीमारी माना जाता था, अब इसके मामले 30 से 40 साल के लोगों में भी तेजी से बढ़ रहे हैं। आखिर क्यों? हाल ही में नेचर जर्नल में छपी एक नई स्टडी इस सवाल का जवाब देती है। इस रिसर्च के मुताबिक, आज की यंग जेनरेशन का शरीर पहले के मुकाबले बायोलॉजिकली तेजी से बूढ़ा हो रहा है और इस बदलाव से कम उम्र में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
जाने ये खतरा कब बढ़ने लगता है ?
इस स्टडी का जिक्र करते हुए एक कार्डियोलॉजिस्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि शरीर की उम्र अब सिर्फ जन्म की तारीख से नहीं, बल्कि उसकी अंदरूनी हालत से भी तय होती है। यानी आपकी असल उम्र और आपके शरीर की बायोलॉजिकल उम्र के बीच जितना ज्यादा अंतर होगा, बीमारी का खतरा उतना ही ज्यादा होगा। रिसर्च में UK बायोबैंक से 1.54 लाख से ज्यादा लोगों के ब्लड सैंपल और अमेरिका के ऑल ऑफ अस रिसर्च प्रोग्राम से 10 हजार से ज्यादा लोगों के हेल्थ डेटा का एनालिसिस किया गया। साइंटिस्ट्स ने 1950 के दशक में पैदा हुए लोगों की तुलना 1965 से 1974 और 1990 के दशक में पैदा हुए लोगों से की। नतीजों में पाया गया कि नई पीढ़ी में बायोलॉजिकल एजिंग की दर पिछली पीढ़ी की तुलना में बहुत तेज़ है।
बायोलॉजिकल उम्र और असल उम्र में क्या अंतर है ?
रिसर्च के अनुसार, शरीर की बायोलॉजिकल उम्र और असल उम्र के बीच जितना ज़्यादा अंतर होगा, कैंसर का खतरा उतना ही बढ़ सकता है। स्टडी में यह भी पाया गया कि जिन लोगों का इम्यून सिस्टम उनकी असल उम्र से ज़्यादा पुराना दिखता था, उन्हें कम उम्र में लंग कैंसर होने का खतरा ज़्यादा था। वहीं, जिन लोगों का फैट टिशू तेज़ी से बूढ़ा हो रहा था, उनमें कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा ज़्यादा देखा गया।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि शरीर के सेल्स में DNA डैमेज होना उम्र बढ़ने के साथ एक नॉर्मल प्रोसेस है। लेकिन अगर यह डैमेज तेज़ी से होने लगे, तो शरीर समय से पहले बूढ़ा होने लगता है। यह कई वजहों से हो सकता है जैसे खराब डाइट, मोटापा, स्मोकिंग, पॉल्यूशन, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और नींद की कमी।
क्या इस्को को धीमा किया जा सकता है?
असल बात यह है कि बायोलॉजिकल एजिंग को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। एक्सपर्ट्स रेगुलर एक्सरसाइज करने, बैलेंस्ड डाइट लेने, हेल्दी वेट बनाए रखने, स्मोकिंग से बचने और पूरी नींद लेने की सलाह देते हैं। रिसर्चर्स का मानना है कि अगर इन हाई-रिस्क लोगों की पहचान कम उम्र में हो जाए, तो समय पर स्क्रीनिंग और बचाव से कैंसर का खतरा कम किया जा सकता है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी रिसर्च स्टडी और एक्सपर्ट की राय पर आधारित है। इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न समझें। कोई भी नई एक्टिविटी या एक्सरसाइज शुरू करने से पहले, अपने डॉक्टर या संबंधित स्पेशलिस्ट से सलाह लें।



