भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पुलिस और राज्य सरकार को एक बड़ी कानूनी राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस व्यापक आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें पुलिस जांच प्रक्रिया पर कड़े दिशा-निर्देश और 390 पन्नों की लंबी चेकलिस्ट थमा दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के साथ ही न्यायपालिका और कार्यपालिका के अधिकारों के संतुलन को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण नज़ीर पेश की है।
मामले की पूरी पृष्ठभूमि और विवाद
यह पूरा मामला ‘उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सुभाष चंद्र व अन्य’ के केस से जुड़ा हुआ है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब पुलिस द्वारा कोर्ट में दाखिल की गई एक ‘क्लोजर रिपोर्ट’ को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) ने खारिज कर दिया था। मजिस्ट्रेट ने पीड़िता की प्रोटेस्ट पिटीशन पर सुनवाई करते हुए आरोपियों को समन जारी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देने के लिए पक्षकार इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे थे।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले से आगे बढ़ते हुए पूरी पुलिस जांच प्रणाली और व्यवस्था को सुधारने की जिम्मेदारी खुद पर ले ली। हाईकोर्ट ने इस सिलसिले में डीजीपी (ट्रेनिंग), एडीजी (क्राइम) और डीजीपी (अभियोजन) जैसे शीर्ष पुलिस अधिकारियों को कोर्ट में तलब कर लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि अभियोजन निदेशालय द्वारा 41 अध्यायों में फैली 390 पन्नों की एक विशाल चेकलिस्ट तैयार की गई। इसके आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 मई 2025 को अपने आदेश के पैरा 33 के तहत यूपी पुलिस के लिए दिशा-निर्देशों और अनिवार्य प्रक्रियाओं का एक लंबा पुलिंदा लागू कर दिया। उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के इस न्यायिक क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर दिए गए आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख और अहम टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। शीर्ष अदालत ने 31 अगस्त 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रवैये पर सख्त असहमति व्यक्त की।
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आपराधिक न्याय प्रशासन को चलाना या राज्य सरकार को प्रशासनिक निर्देश देना संवैधानिक अदालतों का काम नहीं है। जब देश में ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS 2023) जैसे नए और आधुनिक कानून पहले से लागू हैं, तो अदालतों को अपनी तरफ से प्रक्रियाएं तय करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि नए कानून में आधुनिक जांच पद्धतियों, डिजिटल साक्ष्यों के संकलन और फोरेंसिक साक्ष्यों के अनिवार्य इस्तेमाल के विस्तृत प्रावधान पहले से ही मौजूद हैं।
न्यायिक सीमा और कार्यपालिका का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि यदि व्यवस्था में कोई विशिष्ट कमी नजर आती है, तो अदालतें वहां हस्तक्षेप कर सकती हैं। लेकिन व्यापक स्तर पर नीतिगत और प्रशासनिक निर्देश जारी कर अदालतें स्वयं ‘प्रशासक’ की भूमिका नहीं निभा सकतीं।
शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी गहरा आश्चर्य जताया कि जब हाईकोर्ट ने खुद ही मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपियों को भेजे गए समन को रद्द कर दिया था और पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को सही मान लिया था, तो फिर जांच प्रक्रिया की नई नियमावली तय करने के लिए अधिकारियों को तलब करने की क्या औचित्य था? इन मजबूत तर्कों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका को पूरी तरह न्यायसंगत माना और हाईकोर्ट के आदेश में शामिल उन सभी 41 अध्यायों और 390 पन्नों वाले निर्देशों को हटाकर रद्द कर दिया।










