लखनऊ। भारत ने मंगल और चंद्रमा पर सफलतापूर्वक अंतरिक्ष यान भेजे हैं, सैकड़ों उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया है और अब स्काईरूट एयरोस्पेस के जरिए अपना पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च कर एक नया इतिहास रच दिया है। भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था फिलहाल 8.4 अरब डॉलर की है, जो 2020 में निजी निवेश के लिए इस क्षेत्र के खुलने के बाद तेजी से बढ़ी है और 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप्स को आकर्षित कर चुकी है।

भारत की बड़ी उपलब्धियां

भारत 2014 में मंगल की कक्षा में अंतरिक्ष यान भेजने वाला पहला एशियाई देश बना था। चंद्रयान कार्यक्रम के तहत 2008 में लूनर ऑर्बिटर, 2019 में लैंडिंग की असफल कोशिश और 2023 के सफल रोवर मिशन ने भारत को रूस, अमेरिका और चीन के बाद चंद्रमा पर बिना इंसानों वाला यान उतारने वाला चौथा देश बना दिया। 2027 के लिए निर्धारित चंद्रयान-4 मिशन से चांद के सैंपल वापस लाने की उम्मीद है, जबकि 2028 में शुक्र ग्रह की कक्षा में जाने वाला मिशन भी तय है। सूर्य का अध्ययन करने वाला आदित्य मिशन लगातार सूर्य की सबसे बाहरी परतों और अंतरिक्ष के मौसम पर नजर रख रहा है।

समुद्र की गहराई से अंतरिक्ष तक इसरो की टेक्नोलॉजी

इसरो की तकनीक अब भारत की ‘मत्स्य’ पनडुब्बी को विकसित करने में भी मदद कर रही है, जिसका नाम हिंदू देवता विष्णु के मत्स्य अवतार पर रखा गया है। विज्ञान मंत्री जितेंद्र सिंह के अनुसार, 2027 तक यह पनडुब्बी वैज्ञानिकों को समुद्र में छह किलोमीटर नीचे ले जाएगी, ताकि रेयर अर्थ और जरूरी खनिजों सहित गहरे समुद्र के संसाधनों का उपयोग किया जा सके।

सैटेलाइट लॉन्च में भारत का दबदबा

1975 में सोवियत रॉकेट से अपना पहला उपग्रह लॉन्च करने के बाद से इसरो ने कम लागत वाले मिशनों के लिए वैश्विक पहचान बनाई है। अब तक 430 से अधिक विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण कर संस्था 600 मिलियन डॉलर से अधिक की कमाई कर चुकी है और अपने 144 से ज्यादा सैटेलाइट भी लॉन्च कर चुकी है। भारत अब श्रीहरिकोटा में अपने लॉन्चपैड का विस्तार करने के साथ ही तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में एक दूसरा स्पेसपोर्ट भी बना रहा है।

प्राइवेट स्पेस सेक्टर की बढ़ती ताकत

देश के प्राइवेट स्पेस इंडस्ट्री में स्काईरूट एयरोस्पेस के अलावा कई अन्य कंपनियां भी तेजी से उभर रही हैं। Pixxel खेती से लेकर पर्यावरण निगरानी के लिए ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट बना रही है, Bellatrix Aerospace सैटेलाइट प्रोपल्शन सिस्टम पर काम कर रही है और Agnikul Cosmos 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन से चलने वाले छोटे सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल विकसित कर रही है। इनमें से कई कंपनियां रक्षा क्षेत्र को भी सप्लाई करती हैं, जिससे अंतरिक्ष और सुरक्षा के बीच का दायरा लगातार जुड़ता जा रहा है।

मानव अंतरिक्ष उड़ान की तैयारी

इसरो अपने पहले क्रू मिशन ‘गगनयान’ की भी तैयारी कर रहा है, जिसके तहत तीन बिना क्रू वाले परीक्षणों में से पहला 2026 के अंत में होने की उम्मीद है। इस मिशन का लक्ष्य तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिनों के लिए भेजना है। भारतीय वायु सेना के पायलट शुभांशु शुक्ला 2025 में स्पेसएक्स ड्रैगन यान से इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पहुंचने वाले पहले भारतीय बन चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि 2035 तक भारत का अपना स्पेस स्टेशन होगा और 2040 तक चांद पर एक अंतरिक्ष यात्री भेजा जाएगा।

रक्षा और अंतरिक्ष का गहरा तालमेल

भारत के सिविल स्पेस और डिफेंस इंडस्ट्रीज आपस में गहराई से जुड़े हैं और कई कंपनियां दोनों क्षेत्रों के लिए लॉन्च रॉकेट, प्रोपल्शन, सैटेलाइट, इलेक्ट्रॉनिक्स और गाइडेंस सिस्टम बनाती हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ 2025 के टकराव के बाद भारत ने रक्षा खरीद पर अरबों डॉलर खर्च किए हैं, जिसका सीधा लाभ इसरो और उससे जुड़ी कंपनियों को भी मिल रहा है। इसरो के डीआरडीओ और ब्रह्मोस मिसाइल प्रोग्राम के साथ भी करीबी संबंध रहे हैं।

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