वर्ल्ड न्यूज़ : यूरोप की यात्रा करने वाले भारतीय यात्रियों के लिए एक बड़ी और परेशान करने वाली खबर सामने आ रही है। यूरोप का नया एंट्री/एग्जिट सिस्टम (EES) 10 अप्रैल 2026 से पूरी तरह लागू कर दिया गया है, लेकिन यात्रियों की सुविधाओं को बेहतर बनाने के बजाय यह डिजिटल बॉर्डर सिस्टम उनके लिए बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है। इस व्यवस्था के तहत भारत सहित तमाम गैर-यूरोपीय संघ (गैर-EU) देशों से आने वाले यात्रियों के लिए फिंगरप्रिंट और फेशियल बायोमेट्रिक स्कैनिंग अनिवार्य कर दी गई है, जिसके चलते पासपोर्ट स्टैम्पिंग की पुरानी परंपरा अब इतिहास बन चुकी है।

विभिन्न विमानन संगठनों—ACI Europe, IATA और A4E की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 में यूरोप के कुछ प्रमुख एयरपोर्ट्स पर पीक वेटिंग टाइम बढ़कर 5 घंटे तक पहुंच गया है। इस भारी देरी के कारण कई यात्रियों की कनेक्टिंग फ्लाइट्स तक छूट चुकी हैं। फ्रैंकफर्ट और एम्स्टर्डम जैसे बड़े ट्रांजिट हब पर जुलाई के दौरान प्रतीक्षा समय दोगुना हो गया है। अप्रैल में इस सिस्टम के लॉन्च के तुरंत बाद ही ACI Europe ने चेतावनी दी थी कि कई देशों के एयरपोर्ट्स पर औसत इंतजार 2 से 3 घंटे या उससे अधिक का चल रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, असली समस्या इस तकनीक के इस्तेमाल में नहीं, बल्कि शुरुआती पंजीकरण में है। यूरोपीय आयोग के मुताबिक, एक बार रजिस्टर हो चुके यात्री की जांच में औसतन केवल 70 सेकंड का समय लगता है, लेकिन पहली बार आने वाले लगभग हर गैर-EU यात्री को रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके अलावा, तकनीकी गड़बड़ियां, कियोस्क और ई-गेट्स की पर्याप्त संख्या न होना तथा बॉर्डर स्टाफ की कमी जैसी वजहों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

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