लखनऊ। कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा पावरलिफ्टिंग में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाले बिहार के झुन्नू कुमार के लिए उनकी मां कमला देवी के शब्द सबसे बड़ी प्रेरणा बने। मुकाबले से कुछ देर पहले व्हाट्सएप कॉल पर मां ने बेटे से कहा था, ‘बेटा, जब वहां तक पहुंच ही गए हो, तो देश का तिरंगा फहरा कर आना। पहला, दूसरा और तीसरा स्थान में से कोई भी स्थान लेकर आना।’ मेडल जीतने के बाद झुन्नू ने सबसे पहले मां को फोन किया और कहा, ‘तोहनी के आर्शीवाद से जीत गई लो मइया।’

रात 2 बजे तक जागकर देखा मुकाबला

झुन्नू के बड़े भाई कुंदन कुमार ने बताया कि चार भाइयों में झुन्नू सबसे छोटे हैं और एक भाई का निधन हो चुका है। मुकाबले से पहले शुक्रवार रात करीब 8 बजे झुन्नू ने घर फोन किया, तब पूरे परिवार ने ‘विजय भव’ कहकर आशीर्वाद दिया। मां ने कहा, ‘जब वहां तक पहुंच गए हो, तो झंडा फहराकर ही आना।’ पूरा परिवार रात 9 बजे तक खाना खाकर झुन्नू का मुकाबला देखने बैठ गया।

मुकाबला रात करीब 2 बजे शुरू हुआ। जब झुन्नू ने पहली कोशिश में 180 किलो वजन उठाया, तो सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई। जैसे ही उन्होंने 196 किलो वजन उठाकर पदक पक्का किया, घर में तालियां गूंज उठीं।

सब्जी की दुकान से कॉमनवेल्थ तक का सफर

हरनौत के सबनौह डीह गांव के रहने वाले झुन्नू चार भाइयों और तीन बहनों में सबसे छोटे हैं। चार साल की उम्र में पोलियो होने से कमर के नीचे का हिस्सा प्रभावित हो गया था। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और मां-पिता हरनौत बाजार में सड़क किनारे आलू-प्याज बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते थे।

पूरा परिवार किराए के एक कमरे में रहता है। झुन्नू पढ़ाई के साथ मां-पिता के काम में भी हाथ बंटाते थे, लेकिन इसके बावजूद खेल के लिए समय निकालते रहे। बाद में उन्होंने जिम जाना शुरू किया और धीरे-धीरे पावरलिफ्टिंग में रुचि बढ़ती गई। परिवार ने कभी नहीं रोका, बल्कि हर कदम पर पूरा साथ दिया।

बेटे का कॉमनवेल्थ तक पहुंचना ही गर्व की बात

पिता रामानंद पासवान कहते हैं, “बेटे का कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए चयन होना ही हमारे लिए गर्व और खुशी की बात थी। झुन्नू बचपन से ही बहुत होनहार रहा है। वह शारीरिक रूप से दिव्यांग जरूर है, लेकिन उसकी इच्छाशक्ति कभी कमजोर नहीं हुई। आज उसी मेहनत के दम पर विदेश तक पहुंच गया। एक पिता के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है।” सुबह जब झुन्नू के भाई कुंदन बाजार गए, तो रास्ते में लोग रोक-रोककर बधाई दे रहे थे। जो लोग पहले उन्हें दिव्यांगता के कारण झंडू कहकर बुलाते थे, वही अब ‘झंडू जी’ कहकर जीत पर बधाई दे रहे थे।

पैरालंपिक पदक विजेता से मिली ट्रेनिंग

झंडू को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में कई लोगों का योगदान रहा। 2019 से कुंदन कुमार पांडे उनके मार्गदर्शक रहे। बाद में उनका चयन स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र, गांधीनगर में हुआ, जहां उन्हें पैरालंपिक पदक विजेता राजेंद्र सिंह रहेलू से प्रशिक्षण लेने का मौका मिला। बिहार पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन के सचिव संदीप कुमार ने भी हर स्तर पर सहयोग किया।

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