उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के सीकरी गांव में सरकारी जमीन पर चबूतरा बनाकर प्रतिमा स्थापित करने को लेकर हुए खूनी संघर्ष और बवाल के बाद अब स्थानीय प्रशासन, पुलिस और खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस पूरी घटना की इनसाइड स्टोरी यह बयां करती है कि यह बवाल अचानक नहीं भड़का, बल्कि इसके पीछे करीब 12 से 13 घंटे की लंबी प्रशासनिक चूक और उदासीनता शामिल है।
इनपुट्स के मुताबिक, गांव में लंबे समय तक निर्माण कार्य और प्रतिमा स्थापना की तैयारियां चलती रहीं, लेकिन बीट पुलिस से लेकर स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) तक को इसकी भनक तक नहीं लगी या समय रहते इसे रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। जब तक प्रशासनिक अमला हरकत में आया, तब तक बात हाथ से निकल चुकी थी। गुस्साई भीड़ डीएम और एसएसपी को मौके पर बुलाने की मांग पर अड़ी रही, जिसके बाद स्थिति हिंसक हो गई। पथराव में एसडीएम, तहसीलदार और पुलिस के कई वाहनों के शीशे तोड़ दिए गए, और इस झड़ਪ में आधा दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी व पत्रकार घायल हो गए।
बवाल के बाद पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल
घटना के बाद अब पुलिस की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में आ गई है। सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ वीडियो में स्थानीय महिलाओं ने पुलिस पर घरों के दरवाजे तोड़ने, छतों से ईंटें फेंकने और धमकाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। पुलिस ने इस मामले में 32 नामजद और दर्जनों अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया है। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि जब खुलेआम घंटों तक निर्माण कार्य चल रहा था, तब जिम्मेदार अधिकारी कहां थे और क्या अब केवल आम जनता पर कार्रवाई होगी या लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी?



