मन विचलित था। जीवन में अब तक साथ निभाने वाली संगिनी पीछे गाड़ी में चिर निद्रा में लेटी हुई थीं और सिन्हा साहब ड्राइवर के बगल में बैठे थे। गाड़ी चल रही थी, मगर जैसे उनके भीतर कुछ ठहर-सा गया था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। जीवन भर साथ देने वाली संगिनी को घाट तक भला कैसे पहुंचाया जाए?

गाड़ी मोक्ष की नगरी काशी में महाश्मशान की राह के लिए शहर के रास्तों से होते हुए मैदागिन पहुंची। बैरिकेडिंग के कारण ड्राइवर ने गाड़ी सड़क किनारे लगा दी। कभी अपनी हनक से बैरिकेडिंग खुलवाने वाले सिन्हा साहब रिटायरमेंट के बाद नरम पड़ गए थे। ड्राइवर बुदबुदाने लगा, गाड़ी जल्दी खाली करिए। मगर सिन्हा साहब के भाव शून्य थे। वह पीछे लेटी पत्नी की ओर देखते और फिर सामने सड़क की ओर।

धर्मसंकट यही था कि अंतिम यात्रा का धर्म कैसे निभाया जाए।

आठ घंटे में रिश्तेदारों को फोन, लेकिन कोई नहीं पहुंचा

पत्नी को गए आठ घंटे हो चुके थे। इन आठ घंटों में सिन्हा साहब ने सभी रिश्तेदारों को फोन कर दिया था। आवाजें आईं—दुख हुआ सुनकर, लेकिन दूरी बहुत है, हम लोग नहीं आ पाएंगे। कोई अपनी मजबूरी बता रहा था तो कोई आने में असमर्थता जता रहा था।

सिन्हा साहब ने फोन रख दिए। वह वैसे भी ऊंचे पद पर रहे और एकांत पसंद आदमी थे। अपने पद के कारण किसी के यहां आना-जाना उन्होंने कभी जरूरी नहीं समझा।

आज शायद पहली बार उन्हें अपने उस अकेलेपन का अर्थ समझ में आ रहा था। मन में यह भी आया होगा कि किसी के सुख-दुख में खड़े हुए होते, रिश्तों को थोड़ा समय दिया होता तो शायद आज यह धर्मसंकट इतना बड़ा न होता।

पीछे खड़ी गाड़ी में उनकी जीवन संगिनी का शव चार कंधों का इंतजार कर रहा था।

फिर पहुंचे मदद के वो चार कंधे

तभी दूर से चार नौजवान उनके पास आए। थोड़ी बातचीत हुई, कुछ फुसफुसाहट हुई और फिर सिन्हा साहब मान गए।

पत्नी के जाने का गम चेहरे पर था, लेकिन अब चेहरे पर एक सुकून भी था—चलो, अब पत्नी की अंतिम यात्रा तो ठीक से होगी।

चार कंधों पर अंतिम यात्रा घाट की ओर चल पड़ी।

‘राम नाम सत्य है’ के बीच अचानक बजा हूटर

यात्रा आगे बढ़ ही रही थी कि ‘राम नाम सत्य है’ के बीच अचानक हूटर की आवाज सुनाई दी। सिन्हा साहब ने चौंककर पीछे देखा।

मोक्षनगरी में मोक्ष की ओर जाने वाले जिस रास्ते पर शव वाहन तक के जाने की मनाही थी, उसी रास्ते पर हूटर बजाता हुआ वाहनों का काफिला चला आ रहा था। संभवतः किसी वीआईपी का काफिला था, जिसे शायद सिन्हा साहब की पत्नी की अंतिम यात्रा से भी ज्यादा जल्दी थी।

काफिला निकलते ही अंतिम यात्रा फिर आगे बढ़ चली।

उस दिन समझ आए जीवन के दो कड़े सत्य

उस दिन सिन्हा साहब जीवन के दो कड़े सत्य से परिचित हुए। पहला, पद जाते ही लोग भूल जाते हैं। दूसरा, सामाजिक होना केवल मेल-मुलाकात का नाम नहीं है, बल्कि जरूरत के समय किसी के साथ खड़े होने का भी नाम है।

ये चार कंधे कोई रिश्तेदार नहीं थे।

ये काशी में उभरती एक नई परंपरा के प्रतिनिधि थे—ऐसे लोगों की अंतिम यात्रा में कंधा देने की परंपरा, जिनके पास अपना कहने वाला कोई नहीं बचा या जो धीरे-धीरे समाज से कटकर अकेले पड़ गए हैं।

ये लोग अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते हैं और बदले में अपना मेहनताना लेते हैं।

रिश्तों की कमी के बीच निभाया जा रहा अंतिम यात्रा का धर्म

इसे बाजार की व्यवस्था कह सकते हैं, बदलते समाज की जरूरत कह सकते हैं या रिश्तों के कमजोर पड़ने का परिणाम। लेकिन एक सच यह भी है कि इसके कारण किसी की अंतिम यात्रा अकेली नहीं रह जाती।

धर्म की नगरी काशी में अंतिम यात्रा का धर्म कम से कम निभाया जा रहा है।

सिन्हा साहब शायद यह बात देर से समझे, लेकिन उस दिन चार कंधों ने उन्हें बता दिया कि समाज से कटकर जीना आसान हो सकता है, मगर अंतिम यात्रा में चार कंधों की जरूरत हर किसी को पड़ती है।

बोले चार कंधों वाले लोग

सुभाष सोनी: “पैसे के लिए काम शुरू किया था, लेकिन अब हर बार किसी परिवार के साथ खड़े होकर लगता है कि काम सिर्फ पैसे का नहीं है। उस वक्त उन्हें किसी के साथ की जरूरत होती है।”

दीनदयाल गोंड: “शुरुआत में सोचा था, दूसरा काम मिला तो इसे छोड़ देंगे। लेकिन धीरे-धीरे यही काम अपना लगने लगा। अब इसे छोड़ने का मन नहीं होता।”

रमेश: “घरवालों को शुरू में समझ नहीं आता था कि मैं ये क्या कर रहा हूं। अब वे भी समझते हैं। मुझे भी लगता है कि कम से कम किसी के काम तो आ रहा हूं।”

मनीष पाल: “लोग दिनभर फोन में घुसे रहते हैं, एक-दूसरे से दूर हो गए हैं। ऐसे समय में किसी के अंतिम वक्त पर साथ देने वाले कम मिलते हैं। इसलिए हमारी जरूरत पड़ती है।”

'धनराज के राज और IAS अफसर जिंदाबाद' । पॉवर सेंटर WITH VIRENDRA SINGH ।

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