भुवनेश्वर : ओडिशा सरकार ने भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के नेतृत्व में ओलिव रिडले कछुओं पर चल रही तीन साल की रिसर्च पहल की पहली साल की रिपोर्ट जारी की। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन, श्रम एवं ESI राज्य मंत्री गणेश राम सिंह खुंटिया ने रिपोर्ट जारी की। इस अध्ययन में सैटेलाइट टेलीमेट्री, नाव आधारित सर्वे और शोरलाइन एनालिसिस के जरिए ओडिशा के तटीय इलाकों में ओलिव रिडले कछुओं की गतिविधियों, आवास उपयोग, प्रवास और घोंसले बनाने के पैटर्न को समझने का प्रयास किया गया है।
यह रिसर्च ओडिशा वाइल्डलाइफ ऑर्गनाइजेशन, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, धामरा पोर्ट कंपनी लिमिटेड (DPCL) और अडानी फाउंडेशन की साझेदारी में की गई है। DPCL, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड (APSEZ) का हिस्सा है। कार्यक्रम में अडानी फाउंडेशन के CEO डॉ. अभिषेक लखटकिया भी शामिल हुए।
सैटेलाइट टेलीमेट्री के जरिए 10 कछुओं को कुल 1,748 दिनों तक ट्रैक किया गया
ओडिशा के तट पर दुनिया की महत्वपूर्ण ओलिव रिडले नेस्टिंग साइट्स में शामिल गहिरमाथा और रुशिकुल्या स्थित हैं, जहां बड़े पैमाने पर नेस्टिंग होती है। ओलिव रिडले कछुओं को वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 के शेड्यूल-I के तहत कानूनी संरक्षण प्राप्त है। शुरुआती फील्डवर्क गहिरमाथा रूकरी पर केंद्रित रहा, जबकि गहिरमाथा और रुशिकुल्या दोनों क्षेत्रों में सैटेलाइट टैगिंग की गई। सैटेलाइट टेलीमेट्री के जरिए 10 कछुओं को कुल 1,748 दिनों तक ट्रैक किया गया। अध्ययन में नर और मादा कछुओं के मूवमेंट पैटर्न में अंतर सामने आया। नर कछुओं ने ऑफशोर माइग्रेशन पहले शुरू किया, जबकि मादा कछुए लंबे समय तक तटीय पानी के आसपास रहीं। डेटा से कॉन्टिनेंटल शेल्फ और बंगाल की खाड़ी में संभावित चारागाह स्टॉपओवर के संकेत भी मिले।
अध्ययन के दौरान एक मादा कछुए ने 271 दिनों में 6,719 किलोमीटर की दूरी तय की और श्रीलंका के पूर्वी जल क्षेत्र तक पहुंची। वहीं, एक अन्य कछुए ने गहिरमाथा से रुशिकुल्या और फिर वापस करीब 200 किलोमीटर की यात्रा की। इन आंकड़ों से ओडिशा की तटरेखा के अलग-अलग हिस्सों के बीच ओलिव रिडले कछुओं की लंबी दूरी की आवाजाही का पता चलता है।
बोट-बेस्ड सर्वे के दौरान 1,390 अलग-अलग कछुए और 67 मेटिंग जोड़े रिकॉर्ड किए गए
2025-26 के नेस्टिंग सीजन में किए गए बोट-बेस्ड सर्वे के दौरान 1,390 अलग-अलग कछुए और 67 मेटिंग जोड़े रिकॉर्ड किए गए। अधिकांश सिटिंग कोस्टलाइन से दो किलोमीटर के भीतर दर्ज की गईं। रिपोर्ट में ओलिव रिडले के मूवमेंट और हैबिटैट-यूज़ पैटर्न को बेहतर ढंग से समझने के लिए लगातार मॉनिटरिंग की जरूरत पर जोर दिया गया है।
करीब 15 साल बाद ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग फिर शुरू हुई
WII के एंडेंजर्ड स्पीशीज मैनेजमेंट डिपार्टमेंट के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. आर. सुरेश कुमार ने कहा कि करीब 15 साल बाद ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग फिर शुरू हुई है। उनके मुताबिक, इस साझेदारी से कछुओं के मूवमेंट पैटर्न और हैबिटैट इस्तेमाल को लेकर नई जानकारी मिली है, जो सबूतों पर आधारित कंजर्वेशन प्लानिंग के लिए वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराती है।
अडानी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अडानी ने ओलिव रिडले को ओडिशा की प्राकृतिक विरासत का अहम हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि इसके संरक्षण के लिए कछुओं की यात्रा को बेहतर ढंग से समझना जरूरी है। उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के नेतृत्व में ओडिशा सरकार के सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरण संरक्षण पर फोकस का स्वागत किया और इस वैज्ञानिक अध्ययन को समर्थन देने की बात कही।
APSEZ ओडिशा में धामरा और गोपालपुर पोर्ट का संचालन करता है। यह अध्ययन ओडिशा में अडानी फाउंडेशन के संरक्षण प्रयासों का हिस्सा है और पर्यावरणीय स्थिरता पर समूह के फोकस से भी जुड़ा है। अडानी समूह ने 20 से 27 सितंबर 2026 तक क्लाइमेट वीक न्यूयॉर्क में भी हिस्सा लिया था, जहां क्लाइमेट एक्शन और अधिक टिकाऊ ऊर्जा भविष्य की दिशा में वैश्विक चर्चा में भागीदारी की गई।














