डेस्क : मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने पेंटागन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि अमेरिका युद्ध के वास्तविक खर्च को छिपा रहा है और आंकड़ों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है।

अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि अमेरिका को इस कथित “जुए जैसे युद्ध” में अब तक लगभग 100 अरब डॉलर का सीधा नुकसान हो चुका है, जो आधिकारिक तौर पर बताए गए आंकड़ों से कई गुना अधिक है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी करदाताओं पर इसका भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है और प्रति घर महीने का खर्च तेजी से बढ़ रहा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि “पेंटागन झूठ बोल रहा है” और इस पूरे संघर्ष के पीछे की रणनीति से अमेरिका को ही सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। अराघची ने अपने बयान में इजराइल को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि इस नीति से अमेरिका को प्राथमिकता नहीं मिल रही है, बल्कि नुकसान उठाना पड़ रहा है।

इससे पहले ईरान की संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने भी अमेरिका पर तंज कसते हुए कहा था कि ईरान की सीमाएं अमेरिका से कहीं अधिक जटिल और लंबी हैं, इसलिए किसी भी प्रकार की नाकेबंदी या ब्लॉकेड लागू करना आसान नहीं होगा। उन्होंने अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ की टिप्पणी का मजाक उड़ाते हुए सीमाओं की लंबाई को लेकर तुलना भी की थी।

वहीं दूसरी ओर, अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी रक्षा सचिव Pete Hegseth ने कांग्रेस की आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के सामने कहा था कि ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों पर अब तक लगभग 25 अरब डॉलर खर्च किए जा चुके हैं। उन्होंने इस दौरान कांग्रेस के कुछ सदस्यों पर भी तीखी टिप्पणी की थी।

हालांकि इस पूरे मुद्दे पर अमेरिकी डेमोक्रेटिक नेताओं और कई अर्थशास्त्रियों ने सरकार के आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि वास्तविक लागत इससे कहीं अधिक हो सकती है और यह आंकड़ा 630 अरब डॉलर से लेकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है।

रिपोर्टों के अनुसार, पेंटागन ने कांग्रेस को यह भी बताया था कि युद्ध के शुरुआती कुछ दिनों में ही अरबों डॉलर खर्च हो चुके थे, जिससे इस संघर्ष की लागत को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आ रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान और आंकड़ों को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर भी गहराता जा रहा है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय बहस और तेज होने की संभावना है।

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