भारतीय अरबपति गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिका में चल रहे कथित धोखाधड़ी के मामले में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कानूनी विश्लेषण सामने आया है। संघीय आपराधिक प्रैक्टिस से परिचित एक वरिष्ठ अमेरिकी वकील क्रिस मैन के अनुसार, अडानी के खिलाफ आपराधिक आरोपों को खारिज करने की मंजूरी देने से पहले अमेरिकी संघीय न्यायाधीश द्वारा अभियोजकों से पूर्ण स्पष्टीकरण मांगना महज एक “प्रक्रियात्मक आवश्यकता” है। यह इस बात का संकेत बिल्कुल नहीं है कि मामला आगे बढ़ने वाला है या अडानी की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं।
न्यायाधीशों के पास सीमित अधिकार, DoJ का फैसला सर्वोपरि
वकील क्रिस मैन ने नियम 48(ए) का हवाला देते हुए कहा कि न्याय विभाग को किसी भी अभियोग को खारिज करने के लिए अदालत की औपचारिक अनुमति लेनी होती है। ऐसे में न्यायाधीश निकोलस गारौफिस द्वारा अतिरिक्त ब्रीफिंग या सवाल पूछना अमेरिकी कानून में बहुत सामान्य बात है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकी न्याय व्यवस्था में ऐसी कोई आधुनिक मिसाल नहीं है, जहां किसी संघीय अदालत ने न्याय विभाग को उस आपराधिक मामले को आगे बढ़ाने के लिए मजबूर किया हो, जिसे कार्यकारी शाखा खुद ही बंद या खारिज करना चाहती है। आपराधिक अभियोजन का संचालन संवैधानिक रूप से एक कार्यकारी कार्य है, जिसका अदालतें हमेशा सम्मान करती हैं।
अडानी के वकीलों ने कोर्ट के सामने रखीं ये ‘घातक कमजोरियां’
24 जून, 2026 को अदालत को लिखे अपने पत्र में अडानी के कानूनी पक्ष ने अमेरिकी सरकार के इस मामले में कई बुनियादी और गंभीर कमजोरियों को उजागर किया है:
अमेरिकी क्षेत्राधिकार से बाहर: यह पूरा लेनदेन गैर-अमेरिकी संस्थाओं और उधारदाताओं के बीच था। इसके दस्तावेज संयुक्त राज्य अमेरिका से बाहर तैयार और स्वीकृत किए गए थे, और ये अंग्रेजी कानून द्वारा संचालित थे।
रिश्वत नहीं, कमर्शियल डिस्काउंट: भारत के एक पूर्व वरिष्ठ नियामक अधिकारी के साक्ष्य से साबित हुआ कि जिसे ‘अवैध भुगतान’ कहा जा रहा था, वह वास्तव में भारतीय राज्य बिजली कंपनियों को सौर ऊर्जा अनुबंधों के लिए दी गई वैध और पारदर्शी मूल्य रियायतें थीं, न कि कोई रिश्वत।
निवेशकों का कोई नुकसान नहीं: अभियोग में शामिल चार लेनदेनों में से किसी भी निवेशक के पैसे डूबने या नुकसान होने का कोई आरोप नहीं है।
DoJ ने इस मामले की गहन और व्यापक समीक्षा की है, जिसके लिए अडानी के पक्ष ने फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच करीब 500 पन्नों के तथ्य और हार्वर्ड लॉ स्कूल के प्रोफेसरों की विशेषज्ञ रिपोर्ट सौंपी थी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी 13 जुलाई की समय सीमा से पहले अपना विस्तृत जवाब दाखिल कर देगा और यह मामला बिना किसी लंबी सुनवाई के कुछ ही हफ्तों के भीतर पूरी तरह खारिज कर दिया जाएगा।














