भारतीय डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम के लिए आने वाले दिन बेहद अहम होने जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट सोमवार को केंद्र सरकार के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें 2000 रुपये से अधिक के चुनिंदा यूपीआई ‘पर्सन-टू-मर्चेंट’ (P2M) ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का प्रावधान किया गया है।
यह पूरा मामला पिछले छह साल से अधिक समय से पूरी तरह मुफ्त चले आ रहे यूपीआई भुगतानों के भविष्य से सीधा जुड़ा है। केंद्र सरकार के नए ढांचे के मुताबिक, 15 अक्टूबर से यूपीआई के जरिए मर्चेंट को 2000 रुपये से ज्यादा के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू किया गया है, जिसे 75 हजार रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर अधिकतम 300 रुपये तक सीमित किया गया है। हालांकि, आम नागरिकों के बीच होने वाले पर्सन टू पर्सन (P2P) लेनदेन को पूरी तरह सुरक्षित और मुफ्त रखा गया है।
यह जनहित याचिका अधिवक्ता रंजन दत्ता द्वारा दायर की गई है, जिसमें 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर के एमडीआर ढांचे को चुनौती दी गई है। याचिका में मुख्य रूप से आरोप लगाया गया है कि यह लेवी बिना किसी पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता या सार्वजनिक परामर्श के जल्दबाजी में लाई गई है। साथ ही, ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स Act, 2007’ की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिकता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने चिंता जताई है कि बिना किसी विधिवत प्रकाशित वैधानिक दस्तावेज के केवल प्रेस विज्ञप्ति या एफएक्यू के आधार पर शुल्क थोपना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। इसके अलावा, यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड के बीच किए गए अंतर पर भी सवाल खड़े किए गए हैं, क्योंकि रुपे कार्ड पर बिना किसी मौद्रिक सीमा के मुफ्त सुविधा जारी रखी गई है। अब इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ करेगी।












