पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें एक महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसकी छाती दबाकर शारीरिक छेड़छाड़ के आरोपों को भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 के तहत बलात्कार के प्रयास का अपराध नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को प्रथम दृष्टया आपत्तिजनक बताया है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 23 सितंबर को मामले पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में “कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां” हैं।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी को सुने बिना हाईकोर्ट के फैसले को सीधे रद्द नहीं किया जा सकता। CJI ने बिहार के एडवोकेट जनरल एस.डी. संजय से आरोपी को स्थानीय पुलिस के जरिए नोटिस की तामील सुनिश्चित करने को कहा। मामला अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आगे सुनवाई के लिए है।

पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई को क्या फैसला दिया था?

मामला बांका जिले के अमरपुर थाना कांड संख्या 14/2008 से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार, पीड़िता अपने पिता के साथ एक फोटोग्राफी स्टूडियो गई थी। फोटो देखने के बहाने स्टूडियो संचालक ने उसके पिता को बाहर इंतजार करने के लिए कहा और कथित तौर पर अंदर से दरवाजा बंद कर दिया।

आरोप था कि आरोपी ने महिला की सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाकर उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की। महिला के शोर मचाने पर उसके पिता ने दरवाजा तोड़ा, जिसके बाद आरोपी कथित तौर पर वहां से भाग गया।

बांका के अपर सत्र न्यायाधीश-1 ने 1 नवंबर 2023 को आरोपी को IPC की धारा 376/511 के तहत दोषी ठहराया था। इसके खिलाफ अपील पर पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2026 को दोषसिद्धि को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि केवल सलवार उतारने की कोशिश और छाती दबाने के आरोप, बिना ऐसे स्पष्ट कृत्य के जो बलात्कार करने की मंशा को unequivocally स्थापित करे, अपने आप में बलात्कार के प्रयास के अपराध को साबित नहीं करते। कोर्ट ने कहा था कि आरोप अधिकतम महिला की लज्जा भंग करने से जुड़े IPC की धारा 354 के अपराध की ओर संकेत करते हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लिया Suo Motu Cognizance?

यह मामला जुलाई में ही सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। एक अन्य स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पटना हाईकोर्ट के इस आदेश की ओर पीठ का ध्यान दिलाया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर अलग से स्वतः संज्ञान लिया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी रखा गया कि पटना हाईकोर्ट का फैसला उन परिस्थितियों से मिलता-जुलता है, जिनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को लेकर शीर्ष अदालत ने पहले ही स्वतः संज्ञान लिया था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने लिया था Suo Motu एक्शन

इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च 2025 के एक फैसले में नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ने, उसके पायजामे की डोरी तोड़ने और उसे पुलिया की ओर खींचने की कोशिश को बलात्कार के प्रयास के बजाय तैयारी के स्तर पर माना गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में उस फैसले को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब कथित आरोपी पूर्व निर्धारित मंशा के साथ ऐसे प्रत्यक्ष कृत्य कर चुका हो और तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप के कारण अपराध पूरा न हो पाए, तो मामला केवल तैयारी तक सीमित नहीं रहता।

इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता और पीड़ितों के प्रति उचित दृष्टिकोण के लिए दिशानिर्देश तैयार करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई।

क्या होता है Suo Motu?

Suo Motu लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ है—“अपनी पहल पर”।

आम तौर पर अदालत किसी मामले पर तब सुनवाई करती है जब कोई व्यक्ति, संस्था या सरकार याचिका दायर करती है। लेकिन जब अदालत किसी गंभीर मुद्दे या न्यायिक आदेश पर बिना किसी औपचारिक याचिका के स्वयं संज्ञान लेकर कार्यवाही शुरू करती है, तो इसे Suo Motu Cognizance कहा जाता है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के आदेश और उसमें की गई कुछ टिप्पणियों को लेकर स्वतः संज्ञान लिया है। मामले में आरोपी को सुनने के बाद ही आगे का न्यायिक निर्णय लिया जाएगा।

आगे क्या होगा?

अब सुप्रीम कोर्ट आरोपी का पक्ष सुनने के बाद पटना हाईकोर्ट के फैसले और उसमें की गई संबंधित टिप्पणियों की कानूनी समीक्षा करेगा। अभी सुप्रीम कोर्ट ने मामले के अंतिम परिणाम पर कोई फैसला नहीं दिया है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें “तैयारी” और “बलात्कार के प्रयास” के बीच कानूनी अंतर तथा यौन अपराधों की सुनवाई के दौरान न्यायिक भाषा और संवेदनशीलता जैसे मुद्दे सामने आए हैं। हालांकि, इन प्रश्नों पर अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और आदेश से स्पष्ट होगी।

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