वाराणसी : अदाणी फाउंडेशन की अध्यक्ष डॉ. प्रीति अदाणी ने भारत की सभ्यतागत विरासत और प्राचीन ज्ञान को वर्तमान दौर की चुनौतियों से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्राचीन ज्ञान की वास्तविक उपयोगिता तभी है, जब उसे आज की समस्याओं के समाधान और लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाए। सोमवार को वाराणसी में आयोजित इस वैश्विक संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में शिक्षा, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सतत विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेफरी डी. सैच्स , भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल और अन्य प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं।

डॉ. प्रीति अदाणी ने प्राचीन ज्ञान को वर्तमान से जोड़ने पर दिया जोर

अपने मुख्य संबोधन में डॉ. प्रीति अदाणी ने कहा कि प्राचीन ज्ञान केवल पुराना होने के कारण महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसकी असली अहमियत तब सामने आती है, जब उसे समकालीन चुनौतियों के समाधान में इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने भारत की सभ्यतागत विरासत को संरक्षित करने और मानव पीड़ा, असमानता तथा संघर्ष जैसी समस्याओं से निपटने में इसका उपयोग करने की अपील की।

उन्होंने भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और चीन के दार्शनिक कन्फ्यूशियस के विचारों का उल्लेख करते हुए नैतिक व्यवहार, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों की अहमियत बताई। साथ ही भारत की प्राचीन अवधारणा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, को सतत विकास और बेहतर भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया।

22 राज्यों के 7 हजार गांवों में काम कर रहा अडानी फाउंडेशन

डॉ. प्रीति अदाणी ने अडानी फाउंडेशन के तीन दशकों के सामुदायिक विकास कार्यों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि उससे आम लोगों के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव आया है।

उन्होंने सेवा को केवल सहायता देने तक सीमित न मानते हुए समुदाय की जरूरतों को समझने और लोगों को अपना भविष्य बेहतर बनाने में सहयोग करने का माध्यम बताया।गौरतलब है कि 1996 में स्थापित अडानी फाउंडेशन देश के 22 राज्यों के 7,000 गांवों में काम कर रहा है। इसके माध्यम से करीब 1.3 करोड़ लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

भारत नॉलेज ग्राफ से प्राचीन विरासत को मिलेगी नई पहचान

डॉ. अदाणी ने भारत नॉलेज ग्राफ का भी उल्लेख किया। अडानी ग्रुप की ओर से 10 मिलियन डॉलर के सहयोग से समर्थित इस पहल का उद्देश्य भारत के सभ्यतागत ज्ञान को शोध और अध्ययन के लिए अधिक सुलभ बनाना है। यह पहल विभिन्न विषयों के बीच शोध को बढ़ावा देने के साथ 14 डॉक्टरेट शोधार्थियों को भी सहयोग दे रही है। प्रोफेसर जेफरी सैच्स बोले- वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ रही भारत की ताकतसंगोष्ठी में संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क के अध्यक्ष और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेफरी डी. सैच्स ने ‘द रिटर्न ऑफ ए मल्टीपोलर वर्ल्ड’ विषय पर अपने विचार रखे।

उन्होंने वैश्विक आर्थिक शक्ति के बदलते समीकरणों और इसमें भारत की बढ़ती भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। प्रोफेसर सैच्स के मुताबिक, वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी वर्ष 2000 में 5.2 प्रतिशत थी, जो 2026 में बढ़कर 8.5 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। उनके अनुमान के अनुसार यह हिस्सेदारी 2050 तक 13.1 प्रतिशत और वर्ष 2100 तक 15.1 प्रतिशत हो सकती है।

उन्होंने कहा कि आने वाले दशकों में वैश्विक आर्थिक संतुलन एशिया और अफ्रीका की ओर बढ़ सकता है। वहीं अमेरिका, कनाडा और यूरोप की संयुक्त हिस्सेदारी में गिरावट आने का अनुमान है।

अडानी ग्रुप की भूमिका और सामाजिक जिम्मेदारी पर भी चर्चा

प्रोफेसर जेफरी सैच्स ने भारत के बुनियादी ढांचे के विस्तार और आर्थिक विकास में अदाणी ग्रुप की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने भारत और दुनिया में सतत विकास के लिए अदाणी ग्रुप तथा अदाणी फाउंडेशन के प्रयासों की सराहना की।उन्होंने पारिवारिक व्यवसायों की जिम्मेदारी पर भी अपनी बात रखी। उनके मुताबिक, परिवार के नाम से चलने वाले कारोबार केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं होते, बल्कि उन्हें अपनी विरासत और समाज के प्रति योगदान की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।

AI से प्राचीन भारतीय ज्ञान को समझना होगा आसान

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने भी संगोष्ठी को संबोधित किया। उन्होंने भारत की सभ्यतागत विरासत की प्रासंगिकता और आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्राचीन ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की संभावनाओं पर चर्चा की।

उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से पुराने ग्रंथों को समझने, उनके ज्ञान का विश्लेषण करने और भारत की सभ्यतागत विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक सुलभ बनाने में मदद मिल सकती है।

आधुनिक चुनौतियों के समाधान में प्राचीन ज्ञान की भूमिका

वाराणसी में आयोजित इस विश्व संगोष्ठी ने प्राचीन भारतीय ज्ञान, आधुनिक तकनीक, वैश्विक अर्थव्यवस्था और सतत विकास के बीच संबंधों पर व्यापक चर्चा का मंच तैयार किया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की समृद्ध सभ्यतागत विरासत को केवल संरक्षित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों के समाधान में भी उपयोगी बनाना जरूरी है।

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