गाजीपुर: वर्ष 1990 से चले आ रहे एक बहुचर्चित मारपीट और फायरिंग मामले में पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह को बड़ी कानूनी राहत मिली है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) नूतन द्विवेदी की अदालत ने बुधवार को साक्ष्यों के अभाव में उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश दिया। इस फैसले के साथ ही तीन दशक से अधिक समय से चले आ रहे इस कानूनी संघर्ष का औपचारिक पटाक्षेप हो गया है।

क्या था 1990 का मामला?
यह घटना 3 दिसंबर 1990 की है, जब गाजीपुर के सैदपुर थाना क्षेत्र स्थित देवकली पंप कैनाल पर नहर निर्माण का कार्य चल रहा था। आरोप था कि बृजेश सिंह, त्रिभुवन सिंह और विजयशंकर सिंह समेत कई लोग एक नीली मारुति कार में सवार होकर मौके पर पहुंचे थे। ठेकेदार सरफराज अंसारी द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि इन लोगों ने हथियारों से अंधाधुंध फायरिंग की, निर्माण कार्य में बाधा पहुंचाई, वहां मौजूद मजदूरों के साथ मारपीट की और एक ट्रक के टायर में गोली मारकर उसे पंक्चर कर दिया।

क्यों बरी हुए बृजेश सिंह?
लंबे समय तक चली इस न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष ने अपने-अपने तर्क रखे। सीजेएम नूतन द्विवेदी ने उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और रिकॉर्ड पर मौजूद सभी तथ्यों का गहन परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष लगाए गए आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा। इसी आधार पर न्यायालय ने बृजेश सिंह को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त करार दिया।

समर्थकों में राहत
36 वर्षों तक यह मामला न्यायालय में लंबित रहा, जो उस समय काफी चर्चा का विषय रहा था। इस निर्णय के बाद बृजेश सिंह के समर्थकों में खुशी का माहौल है। इस केस के निपटारे को एक बड़ी कानूनी जीत के तौर पर देखा जा रहा है।

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