लखनऊ। गोमती नदी के जलस्तर में लगातार बढ़ोतरी के चलते इटौंजा इलाके में हालात गंभीर बने हुए हैं। बाढ़ से 10 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं और त्राहिमाम का माहौल है। पिछले एक सप्ताह से कई गांवों में बाढ़ का पानी भरा हुआ है, जिससे आठ गांवों की करीब 15 हजार आबादी संकट में है। प्रभावित गांवों में अकड़रिया कला, अकड़रिया खुर्द, दुघरा, हीरा पुरवा, हरदा, जमखनवा, सुल्तानपुर और बहादुरपुर शामिल हैं।
किसानों की 75 प्रतिशत धान की फसल डूबी
बाढ़ के कारण किसानों की करीब 75 प्रतिशत धान की फसल पानी में डूब गई है। खेतों में बोया गया हरा चारा भी बाढ़ में बर्बाद हो गया है, जिससे मवेशियों के सामने चारे का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। भूसा खत्म होने से पशुपालकों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। संतोष के दो मवेशियों की मौत हो चुकी है, जबकि कई पशु बीमार पड़ गए हैं। सुल्तानपुर और बहादुरपुर में भी मवेशी बीमारी की चपेट में आ गए हैं।
आबादी में जलभराव से बीमारियों का खतरा
आबादी में जलभराव होने से बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ गया है। ग्रामीण बाढ़ के पानी के बीच आवागमन करने को मजबूर हैं, जबकि बच्चों का स्कूल जाना भी बेहद मुश्किल हो गया है।
राहत के नाम पर सिर्फ दस्तावेज जमा
राहत के नाम पर अभी सिर्फ दस्तावेज जमा किए जा रहे हैं। फसल मुआवजे के लिए किसानों से कागजात लिए गए हैं। बताया जा रहा है कि पिछले साल 1254 किसानों को फसल मुआवजा मिला था। लगातार तीन साल से बाढ़ की मार झेल रहे किसानों का आरोप है कि हर साल फसलें बाढ़ में बर्बाद हो रही हैं। इससे किसान क्रेडिट कार्ड का कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है। नकदी फसलें बर्बाद होने से घर का खर्च चलाना और बच्चों की फीस भरना भी किसानों के लिए मुश्किल हो गया है।
1985 से तटबंध निर्माण का इंतजार
ग्रामीणों का कहना है कि 1985 से उन्हें तटबंध निर्माण का आश्वासन मिल रहा है, लेकिन 41 साल बाद भी यह काम शुरू नहीं हो सका। उनका मानना है कि अगर तटबंध बन जाता तो हर साल बाढ़ से राहत मिलती और बाढ़ पर खर्च होने वाले लाखों रुपये भी बचते।



