डेस्क : गंगा एक्सप्रेसवे के नवनिर्मित तटबंध इन दिनों अपने पहले मानसून का सामना कर रहे हैं। अगस्त 2026 के अंतिम सप्ताह में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों, विशेषकर उन्नाव और प्रयागराज में लगातार और अत्यधिक बारिश के चलते कुछ स्थानों पर तटबंधों पर वर्षाजनित कटाव (Rain Cuts) और स्थानीय सतही क्षरण देखा गया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन घटनाओं के कारण अब तक किसी भी समय गंगा एक्सप्रेसवे पर यातायात बंद नहीं किया गया है।
गंगा एक्सप्रेसवे का निर्माण ग्रीनफील्ड परियोजना के रूप में किया गया है और इसका निर्माण जनवरी 2026 में पूरा हुआ था। संबंधित क्षेत्रों में तटबंध और ढलान संरक्षण कार्य पूरा होने के बाद यह पहला मानसून है। इन क्षेत्रों की भू-वैज्ञानिक एवं भू-तकनीकी परिस्थितियों में मुख्यतः रेतीली मिट्टी और ब्लैक कॉटन मिट्टी की परतें पाई जाती हैं। तटबंध निर्माण में बड़ी मात्रा में सामग्री अपेक्षाकृत दूर स्थित उधार क्षेत्रों (Borrow Areas) से भी लाई गई है।
लगातार बारिश से बढ़ा सतही बहाव
तकनीकी आकलन के अनुसार वर्षाजनित कटाव मुख्यतः तटबंध की ढलान पर वर्षाजल के अनियंत्रित अथवा केंद्रित बहाव के कारण होने वाला सतही क्षरण है। इसकी तीव्रता वर्षा की तीव्रता और अवधि, तटबंध की ढलान, मिट्टी के गुण, संपीड़न की स्थिति, सतही संरक्षण और जल निकासी व्यवस्था की प्रभावशीलता जैसे कारकों पर निर्भर करती है।
पहले मानसून के दौरान नवनिर्मित तटबंध बार-बार गीला और सूखने, ढलान में वर्षाजल के प्रवेश, सतही बहाव, ऊपरी मिट्टी की संतृप्ति और केंद्रित जल प्रवाह जैसी परिस्थितियों से पहली बार गुजरते हैं। ऐसे में छोटे कमजोर स्थान, मामूली गड्ढे और निर्माण के विभिन्न स्तरों के संपर्क क्षेत्र सतही कटाव के शुरुआती बिंदु बन सकते हैं।
रेतीली मिट्टी और ब्लैक कॉटन मिट्टी भी एक कारक
रेतीली मिट्टी में अपेक्षाकृत अधिक पारगम्यता और कम सामंजस्य होने के कारण तेज बारिश के दौरान पानी तेजी से सतह में प्रवेश कर सकता है। वहीं, सतही जल प्रवाह गति पकड़ने पर मिट्टी के कण अलग होकर ढलान की ओर बह सकते हैं। इससे छोटी नालियां बनती हैं और धीरे-धीरे जल प्रवाह केंद्रित होने के कारण वर्षाजनित कटाव विकसित हो सकता है।
तकनीकी प्रक्रिया को बारिश, सतही बहाव ,मिट्टी के कणों का अलग होना , छोटी नालियों का निर्माण , जल प्रवाह का केंद्रीकरण , क्रमिक कटाव के रूप में समझा जा सकता है।
ऊंचे तटबंधों पर अधिक संवेदनशीलता
ऊंचे तटबंधों पर ढलान की लंबाई अधिक होने के कारण वर्षाजल का प्रवाह मार्ग लंबा हो सकता है। इसके चलते पानी की गति और कटाव क्षमता बढ़ने की संभावना रहती है। विशेषकर चिकनी सतह या छोटे गड्ढों की स्थिति में पानी एक ही स्थान पर केंद्रित होकर स्थानीय कटाव को बढ़ा सकता है। हालांकि, तकनीकी रूप से केवल ऊंचे तटबंध पर वर्षाजनित कटाव होना अपने आप में तटबंध की संरचनात्मक विफलता का संकेत नहीं माना जा सकता। स्थानीय सतही क्षरण को समय पर मरम्मत और उचित सतही संरक्षण के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है।
नवनिर्मित ढलानों पर वनस्पति आवरण अभी पूरी तरह विकसित नहीं
नवनिर्मित तटबंधों की ढलानों पर सतही संरक्षण व्यवस्था, जल निकासी प्रणाली और प्राकृतिक वनस्पति आवरण को पूरी तरह विकसित होने में समय लगता है। वनस्पति की जड़ें मिट्टी को बांधने, सतह की खुरदरापन बढ़ाने और जल प्रवाह की गति कम करने में मदद करती हैं। साथ ही वर्षा की बूंदों के सीधे प्रभाव को भी कम करती हैं। पहले मानसून के दौरान वनस्पति आवरण को पर्याप्त घनत्व और परिपक्वता प्राप्त नहीं हुई हो सकती है। ऐसे में खुले मिट्टी वाले हिस्से सतही कटाव के प्रति अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
वर्षाजनित कटाव और संरचनात्मक विफलता में अंतर
तकनीकी तौर पर वर्षाजनित कटाव और तटबंध की संरचनात्मक अस्थिरता को अलग-अलग समझना जरूरी है। वर्षाजनित कटाव सामान्यतः वर्षाजल के सतही बहाव के कारण तटबंध की बाहरी सतह पर होने वाला स्थानीय क्षरण है।
इसके विपरीत ढलान की अस्थिरता, गहरी सतह पर स्लिप या स्लाइड, अत्यधिक बैठना, पार्श्व गति, संरचनात्मक विकृति से संबंधित दरारें और जल निकासी व्यवस्था की गंभीर विफलता गहरी भू-तकनीकी या संरचनात्मक समस्या के संकेत हो सकते हैं। इसीलिए प्रत्येक वर्षाजनित कटाव वाले स्थान का निरीक्षण किया जा रहा है, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्षरण केवल सतही स्तर तक सीमित है या किसी गहरी भू-तकनीकी समस्या का संकेत है।
इन स्थानों पर विशेष निगरानी
गंगा एक्सप्रेसवे पर ऊंचे तटबंध, लंबी और निरंतर ढलान वाले क्षेत्र, प्राकृतिक भू-ढलान से जुड़े हिस्से, विभिन्न ऊंचाई वाले तटबंधों के जंक्शन, कल्वर्ट, VUP, पुल और जल निकासी संरचनाओं के आसपास के क्षेत्र विशेष निगरानी में रखे जा रहे हैं। इसके अलावा जल निकासी आउटलेट, सतही जल के केंद्रित प्रवाह वाले स्थान, हाल में पूर्ण किए गए ढलान संरक्षण क्षेत्र, अधूरे वनस्पति आवरण वाले हिस्से तथा पूर्व में वर्षाजनित कटाव की मरम्मत किए गए स्थानों पर भी निगरानी की जा रही है।
कटाव की पहचान के बाद करीब दो घंटे में कार्रवाई
वर्षाजनित कटाव वाले स्थानों पर तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई की जा रही है। प्रभावित एवं ढीली सामग्री को हटाने, ढलान की प्रोफाइल को पुनर्स्थापित करने, ढलान संरक्षण को मजबूत करने और जरूरत के अनुसार सतही जल बहाव को नियंत्रित करने के उपाय किए जा रहे हैं।
इसके साथ ही अनुदैर्ध्य नालियों की सफाई, च्यूट/डाउन-ड्रेन की कार्यक्षमता की जांच, बर्म ड्रेन को अवरोधमुक्त रखने, क्रॉस-ड्रेनेज व्यवस्था के सत्यापन और आउटलेट पर कटावरोधी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब तक चिन्हित मामलों में कटाव की पहचान के लगभग दो घंटे के भीतर आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई पूरी कर दी गई है। इसका उद्देश्य स्थानीय सतही कटाव को आगे बढ़कर बड़े कटाव चैनल में बदलने से रोकना है।
अगले 10 दिनों की बारिश को देखते हुए बढ़ाई गई निगरानी
भारतीय मौसम विभाग (IMD) द्वारा अगले 10 दिनों में लगातार भारी वर्षा के पूर्वानुमान को ध्यान में रखते हुए पूरे एक्सप्रेसवे पर अतिरिक्त और सघन निगरानी व्यवस्था लागू की गई है। गंगा एक्सप्रेसवे की 24×7 निगरानी की जा रही है। समर्पित टीमें तटबंधों, ढलानों, जल निकासी व्यवस्था और संवेदनशील स्थानों की लगातार निगरानी कर रही हैं। किसी भी नए वर्षाजनित कटाव की पहचान होते ही उसे यथाशीघ्र ठीक किया जा रहा है।
अब तक यातायात बंद नहीं हुआ
वर्तमान मानसून के दौरान कुछ स्थानों पर स्थानीय वर्षाजनित कटाव देखे जाने के बावजूद अब तक इन घटनाओं के कारण गंगा एक्सप्रेसवे पर यातायात बंद नहीं किया गया है। प्रभावित स्थानों पर भी फील्ड टीमों की निगरानी में आवश्यकतानुसार वाहनों का सुरक्षित संचालन सुनिश्चित किया गया है। गंगा एक्सप्रेसवे पर पर्याप्त मानव संसाधन, मशीनरी और आवश्यक निर्माण एवं मरम्मत सामग्री साइट पर उपलब्ध रखी जा रही है, ताकि जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई की जा सके।
तकनीकी निष्कर्ष के अनुसार वर्तमान वर्षाजनित कटाव को नवनिर्मित तटबंधों के प्रथम मानसून और अत्यधिक वर्षा की परिस्थितियों में उत्पन्न होने वाले प्रबंधनीय सतही क्षरण के रूप में देखा जा रहा है। केवल सतही वर्षाजनित कटाव की मौजूदगी को तटबंध की संरचनात्मक विफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसके साथ गहरी भू-तकनीकी अस्थिरता या संरचनात्मक क्षति के स्पष्ट संकेत न पाए जाएं। आगामी बारिश के दौरान भी सक्रिय निगरानी, त्वरित मरम्मत, प्रभावी जल निकासी प्रबंधन और यातायात सुरक्षा प्रोटोकॉल के जरिए गंगा एक्सप्रेसवे की संरचनात्मक अखंडता, सुरक्षा और परिचालन निरंतरता बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है।



