दुनिया की सबसे मूल्यवान टेक कंपनियों में शुमार एप्पल (Apple) एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में है। आईफोन की प्रीमियम क्वालिटी और लंबी लाइफ का दावा करने वाली इस कंपनी पर उसके ही एक पूर्व कर्मचारी ने बेहद संगीन आरोप लगाए हैं। दावा किया गया है कि एप्पल जानबूझकर पुराने आईफोन मॉडल्स में ‘मालवेयर’ भेजकर उन्हें धीमा कर देता है, ताकि ग्राहक परेशान होकर नया और महंगा मॉडल खरीदने पर मजबूर हो जाएं।

X पर खुलासे से मची सनसनी

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कंपनी के एक पूर्व सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने दावा किया है कि यह पूरी प्रक्रिया एक सोची-समझी रणनीति के तहत काम करती है। पूर्व कर्मचारी के अनुसार, जब भी मार्केट में कोई नया आईफोन लॉन्च होने वाला होता है, कंपनी पुराने मॉडल्स के लिए सॉफ्टवेयर अपडेट जारी करती है। इन अपडेट्स के जरिए डिवाइस में ऐसी कोडिंग या मालवेयर डाले जाते हैं जो फोन की प्रोसेसिंग पावर को कम कर देते हैं। परिणामस्वरूप, यूजर्स को लगता है कि उनका फोन अब पुराना और बेकार हो गया है।

इतिहास दोहरा रहा है खुद को: ‘बैटरी गेट’ स्कैंडल की यादें ताजा

यह पहली बार नहीं है जब एप्पल पर ‘डिवाइस थ्रोटलिंग’ (डिवाइस को जानबूझकर धीमा करना) के आरोप लगे हैं। साल 2017 में ‘बैटरी गेट’ नाम का एक बड़ा विवाद सामने आया था। उस वक्त iOS 10.2.1 अपडेट के बाद iPhone 6 के लाखों यूजर्स ने शिकायत की थी कि उनके फोन अचानक बंद हो रहे हैं। जांच में सामने आया था कि एप्पल ने बैटरी लाइफ बचाने के बहाने फोन की परफॉर्मेंस को कम कर दिया था। उस वक्त कंपनी को भारी जुर्माना भरना पड़ा था और कई देशों में यूजर्स की बैटरी मुफ्त में बदलनी पड़ी थी।

क्या है इस दावे के पीछे की तकनीकी सच्चाई?

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। आईफोन में इस्तेमाल होने वाली लिथियम-आयन बैटरी समय के साथ रासायनिक रूप से पुरानी (Chemically Aged) हो जाती है। आमतौर पर 2 से 3 साल बाद बैटरी की क्षमता 80% तक गिर जाती है। जब कोई भारी सॉफ्टवेयर अपडेट इंस्टॉल होता है, तो प्रोसेसर को अचानक अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पुरानी बैटरी यह पीक पावर सप्लाई नहीं कर पाती, जिससे फोन क्रैश होने से बचने के लिए खुद को स्लो कर लेता है।

यूजर्स की चिंता और कंपनी की चुप्पी

फिलहाल एप्पल ने अपने इस पूर्व कर्मचारी के दावों पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। लेकिन इस खुलासे ने दुनियाभर के उन करोड़ों यूजर्स को चिंता में डाल दिया है जो एप्पल की विश्वसनीयता पर भरोसा कर लाखों रुपए खर्च करते हैं। सोशल मीडिया पर यूजर्स इसे ‘प्लान्ड ऑब्सोलेसेन्स’ (Planned Obsolescence) कह रहे हैं, यानी किसी उत्पाद को जानबूझकर खराब करना ताकि नया सामान बिक सके।

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