प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए अदालत में पेश होना किसी वादी या वकील का मौलिक अधिकार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग न्याय प्रक्रिया को आसान बनाने वाली एक सुविधा है, जिसका इस्तेमाल अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की बेंच ने कहा कि अगर अदालत किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश देती है तो दूरी या अन्य समस्याओं का हवाला देकर इससे बचा नहीं जा सकता।
मामले में याचिकाकर्ता ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी को अपना अधिकार बताते हुए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से इनकार किया था। इसके अलावा उसने अदालत की आंतरिक कार्यप्रणाली से जुड़े मामलों को लेकर चीफ जस्टिस सचिवालय, सर्वर लॉग्स और रोस्टर जैसी जानकारी मांगते हुए 24 आरटीआई आवेदन भी दाखिल किए थे।
हाई कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक कार्यों में बाधा डालने पर सख्त रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि कुछ मामलों में लोग न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, जिससे न्याय प्रशासन पर असर पड़ता है।
अधिकारियों का समय खराब करने, भ्रामक आरटीआई आवेदन दाखिल करने और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने के मामले में हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर ₹6.70 लाख का जुर्माना लगाया है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि जुर्माने की राशि चार सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट लीगल सर्विस कमेटी के खाते में जमा करनी होगी। साथ ही निर्देश दिया गया कि तय समय में राशि जमा नहीं होने पर रजिस्ट्रार जनरल उचित कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।













