साल 2007 में आई फिल्म ‘आवारापन’ के कल्ट स्टेटस को भुनाने के लिए मेकर्स ने इसका सीक्वल ‘आवारापन 2’ सिनेमाघरों में उतार दिया है। फिल्मकारों का यह दावा अक्सर रहता है कि सीक्वल मूल फिल्म से बड़ा होगा, और इस मामले में ‘आवारापन 2’ कई मायनों में खरी उतरती दिखती है। फिल्म की शुरुआत वहीं से होती है जहां पहली कड़ी खत्म हुई थी। हांगकांग में चीनी बौद्ध भिक्षुओं द्वारा बचाए जाने के बाद शिवम पंडित (इमरान हाशमी) भारत लौटता है। अपनी दिवंगत प्रेमिका आलिया की कब्र के पास उसे एक नवजात बच्ची मिलती है, जिसे वह उसी अनाथालय में भेज देता है जहां वह खुद पला-बढ़ा था। वह उस बच्ची का नाम भी ‘आलिया’ रखता है।
कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब उस बच्ची को एक दंपत्ति गोद लेता है, जो असल में मानव तस्कर निकलते हैं। बच्ची को बचाने के लिए शिवम एक बार फिर बैंकॉक का रुख करता है, जहां उसे इंटरपोल के अधिकारी और ड्रग्स रैकेट चलाने वाले अमृत के बेटे जोरावर (पूरब गब्बी) से भिड़ना पड़ता है। बैंकॉक में उसकी मुलाकात जोरावर की बहन जारा (दिशा पाटनी) और भाई सिकंदर से होती है, जबकि शबाना आजमी नफीसा के रूप में एक समानांतर गैंग चलाती नजर आती हैं।
अभिनय की बात करें तो, इमरान हाशमी एक बार फिर अपने पुराने गैंगस्टर और एक्शन अवतार में पूरी तरह जंचे हैं। उन्होंने एक्शन के साथ-साथ भावनात्मक दृश्यों को भी पर्दे पर बखूबी उकेरा है। खलनायक के रूप में पूरब गब्बी ने भी अच्छा प्रभाव छोड़ा है, हालांकि उनके किरदार को थोड़ा और खूंखार बनाया जा सकता था। दिशा पाटनी और शबाना आजमी के हिस्से सीमित भूमिकाएं आईं, जिन्हें उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाया है। बाल कलाकार मायरा शिवन ने भी सराहनीय काम किया है।
लेखन के स्तर पर विशेष भट्ट ने दोनों फिल्मों की कड़ियों को खूबसूरती से जोड़ा है। नितिन कक्कड़ का निर्देशन फिल्म के डार्क और इमोशनल जॉनर के साथ न्याय करता है। हालांकि, कुछ तकनीकी कमियां जैसे नमक में दफनाए जाने के बाद भी चेहरे पर नमक न दिखना, जैसी छोटी-मोटी खामियां जरूर खलती हैं। राजू सिंह का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के मूड को और गहरा करता है। कुल मिलाकर, ‘आवारापन 2’ दर्शकों को भरपूर मनोरंजन देने के साथ-साथ एक भावनात्मक संदेश देने में भी कामयाब रहती है।



