हिंदी सिनेमा के इतिहास में अगर संगीत की बात हो, तो ‘आशिकी’ का नाम सबसे ऊपर आता है। आज भी जब हम ‘सांसों की जरूरत है जैसे’ या ‘मैं दुनिया भुला दूंगा’ सुनते हैं, तो 90 के दशक की यादें ताजा हो जाती हैं। हाल ही में दिग्गज गीतकार समीर अंजान ने इस फिल्म की महासफलता के पीछे के उन संघर्षों और रोचक किस्सों को साझा किया है, जिन्हें सुनकर कोई भी दंग रह जाए।

एक प्राइवेट एल्बम जो बनी इतिहास

समीर अंजान बताते हैं कि ‘आशिकी’ कभी फिल्म के रूप में सोची ही नहीं गई थी। यह तो महज एक प्राइवेट एल्बम बनाने की कोशिश थी, जिसका नाम ‘चाहत’ तय हुआ था। जब महेश भट्ट ने नदीम-श्रवण द्वारा रचित धुनें सुनीं, तो वे इतने मंत्रमुग्ध हो गए कि उन्होंने घोषणा कर दी कि वे इन गानों के इर्द-गिर्द एक पूरी फिल्म रचेंगे। यह भारतीय सिनेमा के लिए एक क्रांतिकारी पल था, क्योंकि यह पहली बार था जब गानों से प्रेरित होकर कहानी लिखी गई थी।

मुंह छिपाकर क्यों बना था पोस्टर?

फिल्म के शुरुआती ट्रायल के बाद डिस्ट्रीब्यूटर्स ने इसे सिरे से नकार दिया था। उनका तर्क था कि फिल्म का म्यूजिक बहुत ‘एल्बम जैसा’ है और फिल्म के लीड एक्टर्स के चेहरे ‘कमर्शियली’ दमदार नहीं हैं। गुलशन कुमार फिल्म को ठंडे बस्ते में डालने वाले थे, तभी महेश भट्ट ने एक ब्लैंक पेपर पर अपने करियर की गारंटी लिख दी।

इस नकारात्मकता को दूर करने के लिए एक मास्टर प्लान तैयार किया गया। फिल्म के पोस्टर में नायक-नायिका का चेहरा नहीं दिखाया गया, बल्कि उन पर एक कोड (कोहरा/हुड) डाल दिया गया। प्रमोशन का यह तरीका इतना कारगर रहा कि लोग म्यूजिक के दीवाने हो गए और जब फिल्म रिलीज हुई, तो वह रातों-रात ब्लॉकबस्टर बन गई। समीर अंजान याद करते हैं कि उस दौर में लोग फिल्म सिर्फ गाने सुनने आते थे और गाना खत्म होते ही हॉल से बाहर निकल जाते थे।

संगीत की अहमियत और आज की पीढ़ी के लिए सीख

समीर अंजान आज के म्यूजिक दौर पर चिंता जताते हुए कहते हैं कि 90 के दशक में संगीत फिल्म की आत्मा होता था। ‘फूल और कांटे’ हो या ‘कयामत से कयामत तक’, इन फिल्मों को म्यूजिक ने स्टार बनाया था। उन्होंने नई पीढ़ी (Gen Z) को सलाह दी कि हिंदुस्तानी संगीत आम आदमी की भावनाओं से जुड़ा है। अगर संगीत में मेलोडी और गहराई नहीं होगी, तो वह कभी भी लॉन्ग-लास्टिंग नहीं हो सकता।

समीर अंजान का यह अनुभव हमें बताता है कि सिनेमा का स्वरूप भले ही बदल जाए, लेकिन अच्छा संगीत हमेशा जिंदा रहता है और वही किसी भी फिल्म को अमर बनाने की ताकत रखता है।

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