नई दिल्ली। भारत में हर कुछ किलोमीटर पर संस्कृति और परंपराएं बदल जाती हैं। यहां के मंदिरों में जहां एक तरफ देवताओं को फल-फूल और मिठाई का भोग लगता है, वहीं कुछ प्राचीन और सिद्ध मंदिर ऐसे भी हैं जहां प्रसाद के तौर पर मांस, मछली और यहां तक कि मदिरा भी चढ़ाई जाती है। आइए आपको देश के ऐसे ही आठ अनोखे मंदिरों के बारे में बताते हैं।
मुनियांदी स्वामी मंदिर, तमिलनाडु
मदुरै के वडक्कमपट्टी गांव में स्थित यह मंदिर भगवान मुनियांदी को समर्पित है, जिन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है। यहां हर साल तीन दिन का भव्य उत्सव मनाया जाता है और इस दौरान भक्तों को प्रसाद के रूप में चिकन और मटन बिरयानी परोसी जाती है। लोग सुबह-सुबह नाश्ते में बिरयानी खाने के लिए भी मंदिर पहुंचते हैं।
विमला मंदिर, ओडिशा
पुरी के जगन्नाथ मंदिर परिसर के अंदर स्थित यह शक्तिपीठ देवी विमला (दुर्गा का अवतार) को समर्पित है। दुर्गा पूजा के दौरान यहां मांस और मछली का भोग लगाया जाता है। हैरानी की बात यह है कि पवित्र मारकंडा तालाब से मछली पकड़कर और बकरे की बलि देकर यह प्रसाद तैयार किया जाता है, लेकिन यह पूरी प्रक्रिया भगवान जगन्नाथ के मुख्य द्वार खुलने से पहले ही पूरी कर ली जाती है।
तरकुलहा देवी मंदिर, उत्तर प्रदेश
गोरखपुर में स्थित यह मंदिर मनोकामनाएं पूरी करने के लिए पूरे देश में मशहूर है। चैत्र नवरात्रि में हजारों की तादाद में श्रद्धालु यहां आते हैं और अपनी मुराद पूरी होने पर देवी को बकरे की बलि चढ़ाते हैं। इसके बाद मिट्टी के बर्तनों में इस मांस को पकाकर भक्तों को प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है।
परासिनिक कडावु मुथप्पन मंदिर, केरल
भगवान मुथप्पन को समर्पित इस मंदिर की मान्यता बेहद अनोखी है। यहां प्रसाद के तौर पर भगवान को जली हुई मछली और ताड़ी चढ़ाई जाती है। माना जाता है कि ऐसा करने से भक्तों की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। मुथप्पन को भगवान विष्णु और शिव का कलियुग का अवतार माना जाता है।
कैलघाट काली मंदिर, पश्चिम बंगाल
देश के 51 शक्तिपीठों में से एक यह करीब 200 साल पुराना मंदिर है। यहां देवी काली को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धालु बकरों की बलि देते हैं और मांस का भोग लगाते हैं।
कामाख्या मंदिर, असम
नीलाचल पहाड़ियों पर बसा यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ तांत्रिक साधना के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। यहां देवी को दो तरह का भोग चढ़ाया जाता है—एक वेज और दूसरा नॉन-वेज। खास बात यह है कि दोनों ही भोग बिना प्याज और लहसुन के बनाए जाते हैं। नॉन-वेज भोग में बकरे का मांस और कभी-कभी मछली की चटनी भी चढ़ाई जाती है। जब यह विशेष भोग चढ़ाया जाता है, तब मंदिर के मुख्य द्वार बंद कर दिए जाते हैं।
तारापीठ, पश्चिम बंगाल
बीरभूम जिले में स्थित इस प्रसिद्ध शक्तिपीठ में देवी को मांस के साथ-साथ शराब का भी भोग लगाया जाता है। बाद में इसी प्रसाद को भक्तों में बांट दिया जाता है।
दक्षिणेश्वर काली मंदिर, पश्चिम बंगाल
यह ऐतिहासिक मंदिर देवी दुर्गा के भक्तों के बीच बेहद लोकप्रिय है। यहां देवी को भोग में मछली चढ़ाई जाती है, जिसे बाद में श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में दे दिया जाता है। हालांकि, इस मंदिर में किसी भी तरह की पशु बलि नहीं दी जाती है।














