लोकतांत्रिक मूल्यों और आम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश सामने आया है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में रेखांकित किया है कि शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और अपनी बात रखने वाले लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लेना पूरी तरह गलत है। अदालत के इस रुख को अभिव्यक्ति की आजादी और मौलिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन को सख्त हिदायत देते हुए कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के नाम पर आम जनता की दिनचर्या और यातायात में बेवजह रुकावट नहीं पैदा की जानी चाहिए। मेट्रो और रेल सेवाओं का संचालन सामान्य रखने के साथ-साथ बिना किसी ठोस और कानूनी कारण के इंटरनेट सेवाओं को ठप करने की प्रवृत्ति पर भी अदालत ने चिंता व्यक्त की है।
इस दौरान न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर लागू धारा 163 (पूर्व में धारा 144) से संबंधित बोर्ड हटाने का निर्देश देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय पाने के लिए सर्वोच्च अदालत के दरवाजे हर नागरिक के लिए बिना किसी डर या संशय के खुले रहने चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं का यह निर्णय यह याद दिलाता है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।













