मुजफ्फरनगर: ‘नो बॉडी नो केस’ यानी लाश नहीं तो मुकदमा नहीं… अपराधियों की इसी संकीर्ण और शातिराना सोच को मुजफ्फरनगर की एक अदालत ने कड़ा सबक सिखाया है। अवैध संबंधों के चलते राजेंद्र सैनी की गला घोंटकर हत्या करने और पहचान छिपाने के लिए उनके शव को बेरहमी से जलाने के मामले में न्यायालय ने दो दोषियों को फांसी (मृत्युदंड) की सजा सुनाई है। अदालत ने इस जघन्य वारदात को ‘विरल से विरलतम’ (Rarest of Rare) श्रेणी का मानते हुए समाज में कड़ा संदेश देने के लिए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

क्या था पूरा मामला?
यह खूनी खेल थाना ककरौली के गांव ककरौली निवासी 35 वर्षीय राजेंद्र सैनी (पुत्र सुखबीर सैनी) के अवैध संबंधों से जुड़ा था। राजेंद्र के अपने ही गांव के वीरसैन की पत्नी उषा के साथ प्रेम संबंध थे, जिसे लेकर दोनों के बीच कई बार विवाद और झगड़ा हुआ था।

बदला लेने की नीयत से 4 जून 2018 को मुख्य आरोपी वीरसैन अपने दो दोस्तों—गजेंद्र उर्फ गीलू (निवासी मेरठ) और रामकिरण उर्फ सावन गिरी (निवासी मेरठ)—के साथ राजेंद्र को काम का बहाना बनाकर बाइक पर बैठाकर ले गया। इन लोगों ने पहले साथ बैठकर शराब पी और जब राजेंद्र को नशा हो गया, तो उसकी गला घोंटकर निर्मम हत्या कर दी। इसके बाद अपनी घृणा को दर्शाने और पुलिस को गुमराह करने के लिए आरोपियों ने मीरापुर के गांव खेड़ी सराय में एक खेत के भीतर राजेंद्र के शव को आग लगाकर बुरी तरह विकृत (अधजला) कर दिया था।

फोरेंसिक साइंस और डीएनए (DNA) ने खोला राज
मुकदमे की सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक कोर्ट-3 के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के न्यायालय में हुई। अभियोजन पक्ष (एडीजीसी कमल कुमार व कुलदीप कुमार) ने अदालत के सामने मजबूत साक्ष्य और 8 गवाह पेश किए।

न्यायालय ने अपने 49 पेज के विस्तृत आदेश में कहा कि दोषियों ने सोचा होगा कि शव को पूरी तरह जला देने से पहचान छिप जाएगी और वे बच निकलेंगे। लेकिन आज के आधुनिक युग में विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) और डीएनए रिपोर्ट ने सत्यता को पूरी तरह सामने ला दिया। अदालत ने दोषियों रामकिरण उर्फ सावन गिरी और गजेंद्र उर्फ गीलू को फांसी की सजा के साथ-साथ 1.10-1.10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। मामले के मुख्य आरोपी वीरसैन की 10 दिसंबर 2025 को मौत हो जाने के कारण उसका नाम केस से पहले ही हटा दिया गया था।

“जो दूसरे की जान लेता है, उसे भी जीने का अधिकार नहीं”—न्यायालय
सजा सुनाते हुए न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने बेहद तल्ख और ऐतिहासिक टिप्पणियां कीं:

ईश्वर का अधिकार: मानवीय जीवन ईश्वर का दिया हुआ सुंदर उपहार है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य मासूम की जान लेता है, तो ऐसे क्रूर व्यक्ति को भी इस समाज में जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है। वह दया का पात्र नहीं है।

कोमल न्याय से गलत संदेश: यदि ऐसे मामलों में अपराधियों के प्रति नरमी दिखाई गई या कोमल न्याय किया गया, तो समाज में गलत संदेश जाएगा। अपराधियों में कानून का खौफ पैदा करने के लिए मृत्युदंड जरूरी है।

चेहरा ओझल करने की चाह: दोषियों ने जिस तरह शव को पूरी तरह जलाया, उससे साफ है कि वे गहरी व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण राजेंद्र सैनी का चेहरा दोबारा देखना ही नहीं चाहते थे और इस अपराध को अपनी नजरों से ओझल करना चाहते थे।

पीड़ित परिवार बोला—”हमें न्याय मिला”
शनिवार को कोर्ट का यह फैसला आने के बाद मृतक राजेंद्र सैनी के भाई बिजेंद्र सैनी और भाभी मीना ने न्यायपालिका के प्रति आभार जताया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि आरोपी उनके भाई को घर से यह कहकर ले गए थे कि कुछ देर में लौट आएंगे, लेकिन उसके बाद वे कभी राजेंद्र का चेहरा तक नहीं देख पाए। पुलिस ने ही शव का अंतिम संस्कार किया था। आज फांसी की सजा सुनकर उनकी आत्मा को शांति मिली है।

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