उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) को लेकर खड़ा हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। तमाम दावों और प्रक्रियाओं के बावजूद वोटर लिस्ट में डुप्लीकेट और फर्जी प्रविष्टियों को लेकर छिड़े घमासान के बीच अब खुद उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय ने यह स्वीकार किया है कि ‘एसआईआर’ (SIR) प्रक्रिया के बाद भी सूची में डुप्लीकेट नाम मौजूद हैं और उन्हें हटाने का काम अभी भी जारी है। हैरानी की बात यह रही कि इस संवेदनशील मामले पर रात ठीक एक बजे सीईओ कार्यालय की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर आधिकारिक सफाई सामने आई।

विवाद तब और गहरा गया जब एक प्रमुख राजनीतिक दल ने चुनाव आयोग को ऐसी लाखों डुप्लीकेट प्रविष्टियों की सूची सौंपी। हालांकि, मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने इस भारी-भरकम संख्या पर असहमति जताई है, लेकिन इसके साथ ही यह भी मान लिया है कि एक ही व्यक्ति द्वारा अन्य मतदाताओं के नाम अवैध रूप से कटवाने के लिए कई ‘फॉर्म-7’ जमा किए जाने की शिकायतें मिली हैं। आयोग का यह भी कहना है कि इन मुद्दों पर पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस और विज्ञप्ति के जरिए स्थिति स्पष्ट की जा चुकी है, लेकिन लगातार सामने आ रहे सबूतों के बाद यह सफाई नाकाफी साबित हो रही है।

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और फैक्टचेकर्स के बीच इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ी हुई है। अलग-अलग लोगों और समूहों द्वारा सबूतों के साथ मतदाता सूची में गंभीर गड़बड़ियों के आरोप लगाए जा रहे हैं, जिन पर आयोग शुरुआत में ठोस जवाब देने में विफल रहा है। धमकी देने के गंभीर आरोपों और वायरल हो रहे मामलों के बीच चुनाव आयोग की कार्यशैली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस ‘एसआईआर’ प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य ही मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिहीन और पारदर्शी बनाना था, उसके बाद भी इतनी बड़ी खामियां क्यों बची हुई हैं? क्या चुनाव आयोग इन सभी मामलों और शिकायतों का बूथवार, दस्तावेजी हिसाब जनता और राजनीतिक दलों के सामने सार्वजनिक करेगा? इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की चुनावी व्यवस्था और पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

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