राजधानी लखनऊ की नगर निगम राजनीति में उस वक्त बड़ा भूचाल आ गया, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मेयर सुषमा खरकवाल के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों को फ्रीज करने का आदेश दे दिया। मामला वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज से निर्वाचित पार्षद ललित किशोर तिवारी को शपथ न दिलाए जाने से जुड़ा है। कोर्ट ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा मानते हुए कड़ा रुख अपनाया है।

क्या है पूरा मामला

जानकारी के मुताबिक, फैजुल्लागंज वार्ड से ललित किशोर तिवारी को निर्वाचित पार्षद घोषित किया गया था, लेकिन चुनाव परिणाम आने के कई महीनों बाद भी उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई। नगर निगम में मेयर द्वारा पार्षदों को शपथ दिलाने की प्रक्रिया पूरी कराई जाती है। इसी देरी को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा। याचिका में आरोप लगाया गया कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को जानबूझकर अधिकारों से वंचित रखा गया, जो संविधान और स्थानीय निकाय व्यवस्था की भावना के खिलाफ है। मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने कोर्ट में पक्ष रखा और आदेश का तत्काल पालन कराने की मांग की।

हाईकोर्ट ने क्यों दिखाई सख्ती

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने साफ कहा कि जब जनता किसी प्रतिनिधि को चुन देती है, तो उसे शपथ दिलाना केवल औपचारिकता नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। कोर्ट ने यह भी माना कि लंबे समय तक शपथ न दिलाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इसी नाराजगी के चलते कोर्ट ने मेयर सुषमा खरकवाल के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार फ्रीज करने का आदेश दिया। अदालत ने संकेत दिया कि जब तक निर्वाचित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक यह कार्रवाई जारी रह सकती है।

नगर निगम में बढ़ी हलचल

हाईकोर्ट के आदेश के बाद लखनऊ नगर निगम में हलचल तेज हो गई है। मेयर पद शहर की प्रथम नागरिक की संवैधानिक जिम्मेदारी माना जाता है और नगर निगम के कई प्रशासनिक फैसले इसी पद से जुड़े होते हैं। ऐसे में अधिकार फ्रीज होने का असर निगम के कामकाज पर भी पड़ सकता है।

कौन हैं सुषमा खरकवाल

सुषमा खरकवाल भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता हैं और मई 2023 में लखनऊ की मेयर बनी थीं। वह लगातार दूसरी महिला मेयर के रूप में चुनी गई थीं। शपथ ग्रहण के समय उन्होंने भ्रष्टाचार मुक्त और तेज विकास का वादा किया था।

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