उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के ऐलान के साथ ही राजनीतिक गलियारों में शह और मात का खेल शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही दल अपनी-अपनी जीत का समीकरण साधने में जुट गए हैं। इसी बीच समाजवादी पार्टी के विधायक आरके वर्मा के एक बयान ने राजनीतिक हलचल को काफी तेज कर दिया है। भारत समाचार से बातचीत के दौरान उन्होंने दावा किया है कि सत्ताधारी दल के लगभग एक दर्जन विधायक अपनी ही पार्टी से असंतुष्ट चल रहे हैं और वे इस चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने के लिए तैयार हैं।
आरके वर्मा के इस दावे से जहां राजनीतिक खेमे में सुगबुगाहट बढ़ गई है, वहीं इसे आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है। अखिलेश यादव के लिए यह चुनाव अपनी पार्टी के विधायकों की निष्ठा और वफादारी परखने का एक बड़ा माध्यम बन गया है। पिछले चुनाव के दौरान पार्टी के कुछ विधायकों ने बगावत का रास्ता चुना था, जिसके बाद इस बार तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारकर सपा आलाकमान यह देखना चाहता है कि कौन से विधायक मजबूती के साथ पार्टी के साथ खड़े रहते हैं।
अगर आंकड़ों और गणित पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के लगभग 37 वोटों की आवश्यकता होती है। समाजवादी पार्टी के पास अपने 101 विधायक हैं और सहयोगी दल कांग्रेस के 2 विधायकों को मिलाकर यह आंकड़ा 103 तक पहुंचता है। दो सीटों पर अपने प्रत्याशियों को जिताने के लिए सपा को महज 74 वोटों की जरूरत है। इसके बाद भी पार्टी के पास करीब 29 से 30 अतिरिक्त वोट बच जाते हैं।
तीसरी सीट पर फतह हासिल करने के लिए समाजवादी पार्टी को 7 से 8 अतिरिक्त वोटों का इंतजाम करना होगा। ऐसे में पार्टी रणनीति बना रही है कि विरोधी खेमे के असंतुष्ट विधायकों या अन्य सहयोगी दलों में सेंधमारी कर अपनी तीसरी सीट का समीकरण सेट किया जाए। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह राजनीतिक दांव कितना कारगर साबित होता है।














