नई दिल्ली। ‘कोई भी मजहब अच्छा या बुरा नहीं होता, अच्छा या बुरा तो इंसान होता है’—इसी सोच के इर्द-गिर्द बुनी गई सनी देओल की फिल्म ‘बटवारा 1947’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म में एक तरफ बंटवारे का दर्द है, तो दूसरी तरफ मजहब की दीवारें। लेकिन क्या यह कहानी दिल को छू पाती है या महज भावुक कर देने वाले दृश्यों तक सीमित रह जाती है? आइए जानते हैं।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की शुरुआत बंटवारे के माहौल से होती है। सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) अपनी पत्नी हमीदा (प्रीति जिंटा), बेटे जावेद (करण देओल) और बेटी तनु के साथ लाहौर पहुंचता है। वहां हबीब (अली फजल) की मदद से उन्हें दुर्गावती किशनपाल देवी (शबाना आजमी) की हवेली में ठिकाना मिलता है, जो दंगों में अपने परिवार को खोकर अकेली रह गई हैं। सिकंदर पहले उन्हें हवेली से निकालना चाहता है, लेकिन बाद में दुर्गावती को अपनी ‘माई’ मान लेता है। इसी बीच कट्टरपंथी याकूब खान (अभिमन्यु सिंह) उन्हें पाकिस्तान से भगाने की पूरी कोशिश करता है और सिकंदर का बेटा जावेद भी उसकी मदद करने लगता है। अब सिकंदर अपनी माई की ढाल बनकर खड़ा होता है—यही फिल्म की असल कहानी है।
राजकुमार संतोषी का डायरेक्शन अधूरा लगा
राजकुमार संतोषी ने ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ जैसी फिल्मों के बाद एक बार फिर सनी देओल के साथ काम किया, लेकिन इस बार उनका निर्देशन थोड़ा अधूरा सा लगता है। कहानी बहुत जल्दी शुरू होती है और हर थोड़ी देर में इमोशनल सीन आते हैं, जिससे दर्शकों का कहानी से गहरा जुड़ाव नहीं बन पाता। डायलॉग्स काफी दमदार हैं, लेकिन कहानी में जरूरत से ज्यादा ठहराव है और कई किरदारों की कहानी अधूरी छूट जाती है।
शबाना आजमी ने बांधा समां
सनी देओल ने सिकंदर मिर्जा के किरदार में भावनाओं का संतुलन बनाए रखा और एक्शन सीन में हमेशा की तरह दमदार रहे। प्रीति जिंटा का किरदार ठीक-ठाक है, लेकिन इसे और बेहतर लिखा जा सकता था। करण देओल अपने पिता के साथ स्क्रीन पर बेटे की भूमिका में हैं, लेकिन उनकी लव स्टोरी अधूरी रह गई। फिल्म की सबसे बड़ी जान शबाना आजमी हैं, जिन्होंने दुर्गावती के रोल में पंजाबी लहजे में जबरदस्त अभिनय किया है। कई मौकों पर उनके डायलॉग दर्शकों की आंखें नम कर देते हैं। अभिमन्यु सिंह का खलनायक वाला किरदार उतना प्रभावशाली नहीं लगता और अली फजल को भी ज्यादा स्क्रीन स्पेस नहीं मिला।
कैसी है पूरी फिल्म?
फिल्म की कहानी बंटवारे के बड़े दर्द को सिर्फ लाहौर के एक मोहल्ले तक सीमित कर देती है। वीएफएक्स और संगीत भी खास प्रभाव नहीं छोड़ते, हालांकि बैकग्राउंड स्कोर भावनाओं के साथ थोड़ा जुड़ाव जरूर बनाता है। फिल्म बनाने की मंशा अच्छी है, लेकिन इसे और बेहतर तरीके से पेश किया जा सकता था। अगर आप सनी देओल का एक्शन और शबाना आजमी की दमदार एक्टिंग देखना चाहते हैं, तो इसे एक बार देखा जा सकता है।














