पीलीभीत: उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का मामला अब अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर चर्चा में है। करीब 13 हजार मतदाताओं के नाम बदलने के आरोपों के बीच एसडीएम मयंक गोस्वामी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। मामले में चुनाव आयोग की ओर से जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ जांच और विधिक कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। वहीं, FIR के निर्देशों के बावजूद मयंक गोस्वामी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
13 हजार मतदाताओं के नाम बदलने का आरोप
पीलीभीत में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर कथित बदलाव का मामला सामने आने के बाद निर्वाचन व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि करीब 13 हजार मतदाताओं के नामों में बदलाव किया गया। हालांकि, इन कथित बदलावों की प्रकृति, जिम्मेदार व्यक्तियों और प्रक्रिया में उनकी भूमिका की पुष्टि जांच के निष्कर्षों से ही हो सकेगी।
SDM मयंक गोस्वामी और हेमंत चौधरी की भूमिका जांच के दायरे में
इस मामले में एसडीएम मयंक गोस्वामी और एसडीएम हेमंत कुमार चौधरी को जिला मुख्यालय से संबद्ध किए जाने की जानकारी सामने आई है। दोनों अधिकारियों की निर्वाचन संबंधी जिम्मेदारियां जांच के दायरे में बताई जा रही हैं। अब यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि मतदाता सूची में कथित बदलाव किस स्तर पर हुए और संबंधित अधिकारियों की क्या भूमिका थी।
FIR के निर्देशों के बाद भी कार्रवाई पर सवाल
मामले में FIR दर्ज करने के निर्देश दिए जाने के बावजूद एसडीएम मयंक गोस्वामी के खिलाफ अब तक कार्रवाई नहीं होने का मुद्दा उठ रहा है। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि निर्देशों के अनुपालन की स्थिति क्या है और संबंधित स्तर पर आगे की कार्रवाई कब तक होगी।
हालांकि, FIR के निर्देश, FIR का वास्तव में दर्ज होना और किसी अधिकारी के खिलाफ विभागीय या आपराधिक कार्रवाई होना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर FIR दर्ज होने या किसी अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी साबित होने की पुष्टि नहीं की जा सकती।
तत्कालीन जिलाधिकारी के कार्यकाल के रिकॉर्ड की जांच अहम
इस मामले में तत्कालीन जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह के कार्यकाल के दौरान मतदाता सूची में हुए कथित बदलावों से जुड़े रिकॉर्ड की जांच भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ज्ञानेंद्र सिंह वर्तमान में बलिया के जिलाधिकारी हैं। जांच में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि बदलाव कब किए गए, उन्हें किस स्तर पर मंजूरी मिली और संबंधित अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी थी।
निर्वाचन व्यवस्था की जवाबदेही पर उठे सवाल
पीलीभीत का यह मामला केवल अधिकारियों की भूमिका तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन की प्रक्रिया की निगरानी पर भी सवाल खड़े करता है। मतदाता सूची में किसी भी तरह की गड़बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है।
अब निगाहें जांच की प्रगति, FIR संबंधी निर्देशों के अनुपालन और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।



