सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और कामकाज को लेकर गंभीर चिंताएं जाहिर की हैं। उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर नियुक्ति की प्रक्रिया मौजूदा सरकार के हाथ में होगी तो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित होगी।

2023 में संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित कानून पारित किया था। इस व्यवस्था में चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। इसी नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी लंबित है।

CEC को हटाने की प्रक्रिया पर भी सवाल

जस्टिस नरीमन ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जैसी है, लेकिन अगर नियुक्ति ही मौजूदा सरकार के हाथ में हो तो हटाने की कठिन प्रक्रिया स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने में पर्याप्त नहीं होगी।

उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ काम करने वाले दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भी मौजूदा सरकार करती है। उनके मुताबिक, यह व्यवस्था चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े करती है।

जस्टिस नरीमन ने सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित व्यक्ति मिलकर चुनाव आयुक्तों के लिए सबसे उपयुक्त नाम तय करें। उनके मुताबिक, ऐसी व्यवस्था जल्द लागू होना बेहतर होगा।

SIR और वोट के अधिकार पर भी जताई चिंता

जस्टिस नरीमन ने पश्चिम बंगाल में हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के बावजूद इस प्रक्रिया पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई।

हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान करीब 89 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में अपील करने वाले मतदाताओं के मामलों में तेजी से सुनवाई के निर्देश दिए और कुछ मामलों की जांच के लिए न्यायिक अधिकारियों की तैनाती भी कराई थी।

जस्टिस नरीमन ने कहा कि वोट देने का अधिकार लोकतंत्र का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है और मतदाता सूची से किसी नागरिक का नाम हटने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सावधानी बरती जानी चाहिए।

चुनाव आयुक्तों की आपत्ति का मुद्दा भी उठाया

जस्टिस नरीमन ने चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट का भी जिक्र किया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर दोनों आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त के कुछ फैसलों पर आपत्ति थी तो उन्होंने कानून में उपलब्ध अधिकारों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया।

उन्होंने कहा कि अगर आयोग के भीतर मतभेद थे और संबंधित आयुक्तों ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया, तो इसकी वजह भी समझने की जरूरत है।

हाल में पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर भी आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई थी। बाद में संबंधित बदलाव को हटाए जाने की खबर आई।

‘वोट देने का अधिकार खतरे में’

जस्टिस नरीमन ने कहा कि आम नागरिक का अधिकार और संविधान व लोकतंत्र की धड़कन माना जाने वाला वोट देने का अधिकार गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करेगा और व्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में कदम उठाएगा।

उनका कहना था कि चुनाव आयोग ऐसी संस्था होनी चाहिए जो अपने संवैधानिक दायित्वों के अनुसार स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करे।

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