दिल्ली हाई कोर्ट ने 2016 में स्कूल जाने वाली नाबालिग के कथित गैंगरेप से जुड़े मामले में एक आरोपी के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अतिरिक्त आरोप तय करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने प्रथमदृष्टया उपलब्ध सामग्री के आधार पर माना कि आरोपी को पीड़िता की जातिगत पहचान की जानकारी होने का संकेत मिलता है। यह फैसला न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने 17 सितंबर को सुनाया।
आरोपी के खिलाफ SC/ST Act की धारा 3(1)(w) में आरोप
हाई कोर्ट ने 2017 के ट्रायल कोर्ट के आदेश में सीमित बदलाव करते हुए आरोपी के खिलाफ SC/ST Act की धारा 3(1)(w) के तहत अतिरिक्त आरोप तय करने का निर्देश दिया। आदेश के बाकी हिस्से को बरकरार रखा गया।
यह मामला पीड़िता की ओर से दायर रिवीजन याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया था। पीड़िता ने IPC की धारा 328, POCSO Act की धारा 14(3) और SC/ST Act की धाराओं 3(1)(e), 3(1)(r) और 3(1)(w) के तहत अतिरिक्त आरोप लगाने की मांग की थी।
स्कूल से रिजल्ट लेने गई थी नाबालिग
मामले के अनुसार, 31 मार्च 2016 को नाबालिग अपने कक्षा 10 का रिजल्ट लेने स्कूल गई थी। आरोप है कि स्कूल के बाहर से आरोपी तरुण उसे उस्मानपुर के 5वें पुश्ता इलाके में ले गया। इसके बाद आरोपी सुमित डेढ़ा उर्फ शन्नू कथित तौर पर कार से वहां पहुंचा और लड़की को नोएडा ले जाया गया, जहां उसके साथ कथित तौर पर दुष्कर्म किया गया और घटना के बारे में किसी को बताने पर धमकी दी गई।
हाई कोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयान में भी अपने आरोप दोहराए थे। बयान में उसने दूसरे आरोपी पर दुष्कर्म करने और तीसरे आरोपी पर घटना का वीडियो बनाने तथा दुष्कर्म का प्रयास करने का आरोप लगाया था।
शुरुआती शिकायत में जाति का जिक्र नहीं होने पर कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि शुरुआती शिकायत में पीड़िता की जाति से जुड़ा आरोप नहीं था और करीब छह महीने बाद इस पहलू का उल्लेख किया गया, इसलिए SC/ST Act लागू नहीं हो सकता।
कोर्ट ने कहा कि एक स्कूल जाने वाली नाबालिग, जो कथित गैंगरेप जैसी घटना से गुजरी हो, वह गंभीर सदमे, मानसिक आघात और अपमान की स्थिति में हो सकती है। ऐसे में घटना के तुरंत बाद हर पहलू को याद करना और स्पष्ट रूप से व्यक्त करना प्रभावित हो सकता है।
आरोपी को पीड़िता की जाति की जानकारी होने का प्रथमदृष्टया आधार
धारा 3(1)(w) के संबंध में कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में यह स्थापित करना जरूरी नहीं है कि कथित कृत्य केवल पीड़िता की जाति के कारण किया गया था। प्रावधान के तहत आरोपी को पीड़िता की जातिगत पहचान की जानकारी होना महत्वपूर्ण है।
जिस आरोपी के खिलाफ अतिरिक्त आरोप तय करने का निर्देश दिया गया, उसके मामले में कोर्ट ने प्रथमदृष्टया ऐसी जानकारी के संकेत पाए। कोर्ट ने नोट किया कि आरोपी और पीड़िता एक-दूसरे को जानते थे और एक ही इलाके में रहते थे। आरोपी के अपने बयान में पीड़िता को उसकी गर्लफ्रेंड बताया गया था। कोर्ट ने इसे उसकी जातिगत पहचान की जानकारी होने की वैधानिक धारणा के लिए प्रासंगिक माना।
इसके अलावा, पीड़िता की पूछताछ रिपोर्ट में भी आरोपी पर जाति से जुड़ी टिप्पणी करने का आरोप था। कोर्ट ने इन तथ्यों को अतिरिक्त आरोप तय करने के लिए पर्याप्त प्रथमदृष्टया सामग्री माना।
सह-आरोपी के खिलाफ अतिरिक्त आरोप से इनकार
हाई कोर्ट ने दूसरे सह-आरोपी के खिलाफ यही आरोप बढ़ाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के अनुसार वह आरोपी से घटना वाले दिन पहली बार मिली थी और इससे पहले उसे नहीं जानती थी।
कोर्ट को ऐसा कोई प्रथमदृष्टया सामग्री नहीं मिली, जिससे यह संकेत मिले कि सह-आरोपी को घटना से पहले पीड़िता की जातिगत पहचान की जानकारी थी।
जाति के आधार पर अपमान के आरोप में भी राहत नहीं
कोर्ट ने SC/ST Act की धाराओं 3(1)(e) और 3(1)(r) के तहत आरोप बहाल करने से भी इनकार कर दिया। कोर्ट के मुताबिक, उपलब्ध सामग्री से प्रथमदृष्टया यह साबित नहीं होता कि कथित कृत्य पीड़िता को उसकी जाति के कारण सार्वजनिक रूप से अपमानित, बेइज्जत या धमकाने के इरादे से किए गए थे।
नशीला पदार्थ पिलाने के आरोप पर भी चार्ज नहीं
पीड़िता को बीयर में नशीला पदार्थ मिलाकर पिलाने के आरोप पर कोर्ट ने IPC की धारा 328 के तहत आरोप तय करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि कथित नशीले पदार्थ या खाली बोतल बरामद नहीं हुई और मेडिकल जांच में भी किसी नशीले पदार्थ के दिए जाने का संकेत नहीं मिला।
इसी तरह POCSO Act की धारा 14(3) के तहत आरोप बहाल करने से भी कोर्ट ने इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि वीडियो रिकॉर्ड किए जाने के पीड़िता के आरोप के अलावा ऐसा कोई सहायक साक्ष्य, मोबाइल फोन की बरामदगी या इलेक्ट्रॉनिक सबूत नहीं मिला, जिससे वीडियो बनाए जाने की पुष्टि हो सके।













