डेस्क : भारतीय कॉरपोरेट जगत के सबसे बड़े घराने टाटा समूह में चेयरमैन की कुर्सी को लेकर एक नया और बड़ा टकराव खुलकर सामने आ गया है। टाटा संस के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को पांच साल का नया कार्यकाल देने की मंजूरी दे दी है, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स ने इस प्रस्ताव को ‘गैरकानूनी’ करार दिया है। इस विवाद के तूल पकड़ने से टाटा समूह के भीतर नेतृत्व और प्रशासनिक नियमों की व्याख्या को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
टाटा में सत्ता का महासंग्राम: चंद्रशेखरन को बोर्ड की मंजूरी, नोएल टाटा का विरोध। ट्रस्ट्स ने फैसला बताया ‘गैरकानूनी
टाटा में चेयरमैन की कुर्सी को लेकर बड़ा टकराव खुलकर सामने आ गया है। चार निदेशक एक तरफ, नोएल टाटा दूसरी तरफ और अब बोर्ड के फैसले की वैधता पर सीधा सवाल।
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— भारत समाचार | Bharat Samachar (@bstvlive) September 17, 2026
विवाद की मुख्य वजह यह है कि टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार, एन. चंद्रशेखरन ने खुद 12 अगस्त को कहा था कि वह अगला कार्यकाल नहीं चाहते हैं। ट्रस्ट्स का दावा है कि इसके अगले ही दिन उनके निर्णय को स्वीकार कर नए चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन सितंबर में अचानक उनकी पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव सामने आ गया। ट्रस्ट्स की दलील है कि चेयरमैन की नियुक्ति के लिए केवल बोर्ड का बहुमत पर्याप्त नहीं है, बल्कि कंपनी के नियमों के मुताबिक टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की जरूरी सहमति होना भी अनिवार्य है। नोएल टाटा ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब नोएल टाटा ने देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की कानूनी राय बोर्ड के सामने पेश की, लेकिन ट्रस्ट्स का दावा है कि बोर्ड ने इसका कोई संज्ञान नहीं लिया। हालांकि यह टाटा ट्रस्ट्स का दावा है, किसी अदालत का फैसला नहीं है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि बोर्ड ने किस कानूनी आधार पर आगे बढ़ने का फैसला लिया और क्या दोनों पक्ष अपने दस्तावेज सार्वजनिक करेंगे। टाटा समूह में चल रही यह तकरार कंपनी चलाने के अधिकार और जवाबदेही की एक बड़ी परीक्षा बन गई है।



