इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के अंतर्गत ‘अग्रेतर विवेचना’ (Further Investigation) को लेकर बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट विधिक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत के इन निर्देशों से यह साफ हो जाता है कि चार्जशीट या अंतिम आख्या दाखिल होने के बाद पुलिस किस प्रकार और किन सीमाओं के भीतर रहकर आगे की जांच कर सकती है।

हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, किसी भी विवेचक को अंतिम रिपोर्ट या आरोप पत्र दाखिल होने के बाद अपनी मर्जी से कोई कदम उठाने के बजाय, सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष औपचारिक प्रार्थना पत्र देकर पूर्व-अनुमति लेनी अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अग्रेतर विवेचना का आदेश देने का विवेकाधिकार पूरी तरह से न्यायालय में निहित है। इसके लिए विवेचक को यह तथ्य न्यायालय के संज्ञान में लाना होता है कि मामले की तह तक पहुंचने और सत्य का पता लगाने के लिए नए साक्ष्यों का परीक्षण जरूरी है।

इसके अलावा, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि विवेचक को केवल ‘अग्रेतर विवेचना’ करने का अधिकार है, न कि मामले की नए सिरे से री-इन्वेस्टिगेशन करने का। नए सिरे से जांच करने का अधिकार केवल असाधारण परिस्थितियों में संवैधानिक अदालतों के पास होता है। यदि मजिस्ट्रेट द्वारा पूर्व में फाइनल रिपोर्ट स्वीकार भी कर ली गई हो, तब भी नए साक्ष्य मिलने पर आगे की जांच पर कोई विधिक रोक नहीं है। इसके लिए पूर्व आदेश को निरस्त कराने की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अभियुक्त को पूर्व-सूचना देने या उसकी सहमति लेने की कोई बाध्यता नहीं है, बशर्ते विवेचक पूरी तरह से निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से अपनी कार्रवाई को आगे बढ़ाए।

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