सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के दौर में सार्वजनिक तौर पर दिए गए बयान कई बार कानूनी विवाद का कारण बन जाते हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़े पुराने विवाद के बीच हिंदुवादी एक्टिविस्ट स्वतंत्र भारद्वाज का एक इंटरव्यू वायरल हो रहा है। इसमें उन्होंने निशु आजाद के पिता पर हमला करने की बात कही है। इस दावे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि कैमरे के सामने दिया गया ऐसा बयान अदालत में किस हद तक साक्ष्य बन सकता है।
पॉडकास्ट में स्वतंत्र भारद्वाज का दावा
वायरल डिजिटल इंटरव्यू में स्वतंत्र भारद्वाज ने जंतर-मंतर पर प्रतीकात्मक प्रदर्शन करने वाली छात्रा निशु आजाद के पिता का सिर फोड़ने का दावा किया। बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि उनके खिलाफ जानलेवा हमले जैसी गंभीर धाराएं लगनी चाहिए थीं, लेकिन दिल्ली पुलिस ने सख्त कार्रवाई नहीं की। उन्होंने बड़े राजनीतिक चेहरों के संरक्षण में होने का भी दावा किया।
इन बयानों के सामने आने के बाद पुलिस कार्रवाई और अदालत में ऐसे बयान की कानूनी अहमियत को लेकर बहस शुरू हो गई है।
एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन क्या होता है?
कानून की नजर में जब कोई व्यक्ति जज या मजिस्ट्रेट के सामने बयान देने के बजाय किसी सार्वजनिक मंच, मीडिया या किसी अन्य व्यक्ति के सामने अपराध स्वीकार करता है, तो इसे Extra-Judicial Confession कहा जाता है। भारतीय साक्ष्य संहिता 2023 के प्रावधानों के संदर्भ में ऐसे बयानों को साक्ष्य के तौर पर पेश किए जाने का सवाल परिस्थितियों और उनकी विश्वसनीयता के आधार पर देखा जाता है।
इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के लिए जरूरी प्रक्रिया
पॉडकास्ट में रिकॉर्ड किया गया वीडियो या ऑडियो इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की श्रेणी में आता है। ऐसे डिजिटल कंटेंट को अदालत में पेश करते समय कानून में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी होता है।
Electronic Evidence को प्रमाणित करने के लिए धारा 63 के तहत विशेष प्रमाण पत्र की आवश्यकता बताई गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संबंधित ऑडियो या वीडियो में किसी तरह की एडिटिंग या छेड़छाड़ नहीं हुई है और रिकॉर्डिंग प्रामाणिक है।
बयान से पलटने पर क्या होगा असर?
मामला आगे बढ़ने पर आरोपी अपने पुराने बयान को व्यंग्य या आत्मरक्षा में कही गई बात बता सकता है। स्वतंत्र भारद्वाज ने भी अपने बयान को इसी तरह पेश किया है।
ऐसी स्थिति में अदालत यह देख सकती है कि बयान किस परिस्थिति में दिया गया था और क्या व्यक्ति ने इसे बिना किसी दबाव या डर के, पूरी समझ के साथ दिया था। बाद में बयान से पलटना अपने आप में पहले बयान की कानूनी अहमियत को खत्म नहीं करता, बल्कि उसकी विश्वसनीयता और परिस्थितियों का आकलन किया जाता है।
दूसरे सबूतों से मिलान जरूरी
सिर्फ एक वीडियो क्लिप के आधार पर किसी व्यक्ति को सीधे दोषी करार नहीं दिया जाता। पुलिस को वायरल बयान की पुष्टि के लिए दूसरे उपलब्ध साक्ष्यों की भी जांच करनी होगी।
इसमें पीड़ित की मेडिकल रिपोर्ट, घटनास्थल से जुड़े गवाहों के बयान और फॉरेंसिक रिपोर्ट जैसे साक्ष्य शामिल हो सकते हैं। यदि ये साक्ष्य पॉडकास्ट में कही गई बातों से मेल खाते हैं, तो मामले की मजबूती बढ़ सकती है और अदालत में इनका महत्व बढ़ सकता है।













