उत्तर प्रदेश में आपराधिक न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम और कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य के डीजीपी को निर्देश दिए हैं कि पुलिस अधिकारियों को अब गवाहों के बयान उनकी अपनी ही भाषा में दर्ज करने होंगे, और बयानों में अपनी तरफ से कोई भी सामग्री या भ्रामक तथ्य जोड़ने की प्रथा पर तत्काल प्रभाव से रोक लगानी होगी।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की तल्ख टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने पुलिस की मौजूदा कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई और इसे “बिल्कुल गलत” करार दिया। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि, “आपराधिक न्याय प्रशासन का उद्देश्य केवल दोषियों को सजा दिलाना नहीं है, बल्कि निर्दोष व्यक्तियों को बचाना भी है।” अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए कि धारा 180 BNSS के तहत बयान दर्ज करते समय पुलिस अधिकारियों को गवाहों से दोषपूर्ण, भ्रामक या ‘लीडिंग’ (Leading) सवाल पूछने से बचना चाहिए, जो सीधे तौर पर आरोपी को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति रखते हों।
डीजीपी को सभी पुलिस अधिकारियों के लिए निर्देश जारी करने का आदेश
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को यह सुनिश्चित करने का कड़ा निर्देश दिया है कि वे प्रदेश के सभी थानों और अधिकारियों को इस संबंध में तत्काल सर्कुलर जारी करें। कोर्ट के नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, गवाह द्वारा घटना के संबंध में जो भी संस्करण बताया जाए, उसे ज्यों का त्यों दर्ज किया जाना चाहिए। पुलिस केवल कुछ विशिष्ट बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांग सकती है, लेकिन अपनी तरफ से गवाहों को कोई बयान सुझाने का अधिकार नहीं है। इस फैसले से आपराधिक मामलों की जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता आने की पूरी उम्मीद है।












