उत्तराखंड के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से एक दिन में शपथपत्र देने के लिए कहा है। खासकर, आईजी स्तर के वरिष्ठ अधिकारी अरुण मोहन और नीरू गर्ग को डीआईजी के पद पर जबरन भेजे जाने के मामले में अदालत ने यह सवाल उठाया है कि इन अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की मांग केंद्र सरकार ने की थी या राज्य सरकार ने अपनी ओर से यह पहल की थी।
हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय शामिल थे, ने यह स्पष्ट करने के लिए आदेश दिया कि इन अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की शुरुआत राज्य सरकार ने की थी या यह केंद्र सरकार का निर्णय था। इस मामले की सुनवाई 16 मार्च को की जाएगी, और उच्च न्यायालय ने एक दिन के भीतर केंद्र और राज्य सरकार से अपना जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
गौरतलब है कि आईजी स्तर की अधिकारी नीरू गर्ग को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में डीआईजी पद पर भेजा गया था, जबकि आईजी अरुण मोहन जोशी को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में डीआईजी के पद पर तैनात किया गया था। इन अधिकारियों ने दावा किया था कि उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आवेदन नहीं किया था और वे आईजी के पद पर कार्यरत थे। वे यह भी कह रहे थे कि उन्हें जबरन नीचे के डीआईजी पद पर भेजा जा रहा था।
इन अधिकारियों ने यह भी कहा कि हाल ही में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर रोक लगाने के बाद, उन्हें पांच वर्ष के लिए डिबार कर दिया गया था, लेकिन राज्य सरकार ने फिर भी 16 फरवरी 2026 को गृह मंत्रालय को उनके नाम भेज दिए। इसके बाद केंद्र ने इनकी प्रतिनियुक्ति पर तैनाती की घोषणा की।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यदि अधिकारियों को इस निर्णय पर आपत्ति थी तो उन्हें केंद्रीय प्रशासनिक अभिकरण (कैट) में जाना चाहिए था। वहीं, याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कहा कि डेपुटेशन पर भेजने का प्रस्ताव राज्य सरकार का था, इसलिए इस मामले में सुनवाई हाईकोर्ट में की जानी चाहिए।
अब अदालत ने राज्य और केंद्र सरकार से 24 घंटे के भीतर जवाब तलब किया है, जिससे यह मामला और भी दिलचस्प हो गया है। अदालत की सख्ती के बाद दोनों सरकारों को अब अपने पक्ष को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना होगा।



