इलाहाबाद, 12 अप्रैल: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने BNSS के सेक्शन 106 को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि इस सेक्शन के तहत पुलिस को प्रॉपर्टी को अटैच करने से पहले किसी व्यक्ति को नोटिस देने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने इसे BNSS के सेक्शन 107 से अलग कर दिया, जिसमें खास तौर पर यह नियम है कि मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को नोटिस जारी करेंगे, जिसकी प्रॉपर्टी अटैच करनी है।

BNSS के सेक्शन 106 के तहत पुलिस को किसी भी प्रॉपर्टी को ज़ब्त करने का अधिकार है, यदि उस पर चोरी का आरोप हो या यदि वह ऐसे हालात में पाई जाए जिससे किसी जुर्म का शक हो। वहीं, सेक्शन 107 में प्रॉपर्टी की कुर्की से संबंधित प्रक्रिया को निर्धारित किया गया है, जिसमें पुलिस को प्रॉपर्टी कुर्क करने से पहले सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस या कमिश्नर से अनुमति प्राप्त करनी होती है। इसके बाद, पुलिस को अधिकार क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के सामने अर्ज़ी देनी होती है, और मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस जारी करके सुनवाई का मौका देने के बाद कुर्की का आदेश देता है।

जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की बेंच ने कहा कि कानूनी प्रावधान में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि प्रॉपर्टी के मालिक को पहले से नोटिस दिया जाए या कोर्ट का आदेश लिया जाए, जैसा कि सेक्शन 107 में किया जाता है। कोर्ट ने कहा कि सेक्शन 106 की भाषा साफ़ और स्पष्ट है, और इसमें प्रॉपर्टी अटैच करने का अधिकार सीधे पुलिस अधिकारी के पास है, जो कानून द्वारा बताए गए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के अधीन होता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर हम यह मानें कि सेक्शन 106 के तहत प्रॉपर्टी अटैच करने के लिए पहले नोटिस या कोर्ट का आदेश जरूरी है, तो इसका उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा, जो प्रॉपर्टी को बचाने और अपराध से जुड़े गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए था।

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