उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची में लगातार सामने आ रही गंभीर धांधलियों और गड़बड़ियों को लेकर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने अब तक का सबसे कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र में हजारों मतदाताओं के विवरण में बिना किसी वैध फॉर्म या दस्तावेज के बदलाव किए जाने का मामला उजागर होने के बाद प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है। इसके बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल छोटे कर्मचारियों पर ही नहीं, बल्कि DM और मंडलायुक्तों की भी सीधी जवाबदेही तय की जाएगी।
बता दें, मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा जारी कड़े दिशानिर्देशों के तहत 10 अप्रैल 2026 से अब तक फीड किए गए सभी फॉर्म-6, 7 और 8 की अनिवार्य और गहन जांच के आदेश दिए गए हैं। कंप्यूटर सहायकों द्वारा सीधे फॉर्म फीड करने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। आयोग ने चेतावनी दी है कि यदि किसी भी स्तर पर वोटर लिस्ट में छेड़छाड़ पाई जाती है, तो संबंधित निर्वाचक पंजीयन अधिकारी (ERO), सहायक निर्वाचक पंजीयन अधिकारी (AERO) और कंप्यूटर सहायक के खिलाफ लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा-32 के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। इसके साथ ही बुलंदशहर, सीतापुर, गाजियाबाद और अलीगढ़ के जिला निर्वाचन अधिकारियों द्वारा डुप्लीकेट वोटरों से जुड़ी रिपोर्ट समय पर न भेजने पर आयोग ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है।
हालांकि, इस कड़ाई के बीच प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया समाप्त होने के छह महीने बाद भी मतदाता सूचियों में इस स्तर की जांच और खामियों की नौबत क्यों आ रही है? विपक्षी दलों का आरोप है कि बड़ी गड़बड़ियों में सिर्फ बीएलओ या ऑपरेटरों पर गाज गिराकर बड़े अधिकारियों को बचा लिया जाता है। आयोग की इस नई सख्ती ने राज्य में निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया और प्रशासनिक निगरानी के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।













