राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चौधरी जयंत सिंह को एनडीए कोटे से दोबारा राज्यसभा भेजे जाने की चर्चाओं पर फिलहाल विराम लग गया है। भाजपा की ओर से राज्यसभा के लिए आठ उम्मीदवारों के नाम घोषित किए जाने के बाद इन कयासों पर ब्रेक लग गया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि भाजपा के सहयोग से जयंत एक बार फिर उच्च सदन पहुंच सकते हैं।
सपा-रालोद के संयुक्त उम्मीदवार बने थे जयंत
जयंत चौधरी जुलाई 2022 में सपा-रालोद के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे थे। उस समय 403 सदस्यीय विधानसभा में रालोद के आठ विधायक थे। एक उम्मीदवार को जीत के लिए 34 वोट चाहिए थे।
सपा के 111, रालोद के आठ और सहयोगी दलों के समर्थन से गठबंधन तीन उम्मीदवार जिताने की स्थिति में था। जयंत को सपा के समर्थन से तीसरे उम्मीदवार के तौर पर उतारा गया था। बाद में खतौली उपचुनाव जीतकर रालोद के विधायक नौ हो गए।
2024 में रालोद ने बदला राजनीतिक गठबंधन
2024 लोकसभा चुनाव से पहले रालोद ने सपा का साथ छोड़कर एनडीए का दामन थाम लिया। इसके बाद चर्चा थी कि अखिलेश यादव के समर्थन से मिली राज्यसभा सीट का ‘सियासी एहसान’ भाजपा के सहयोग से चुकाया जा सकता है।
हालांकि, जयंत चौधरी की मौजूदा राज्यसभा सदस्यता जुलाई 2028 तक है। ऐसे में उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजे जाने की चर्चाओं पर भाजपा के आठ उम्मीदवारों की घोषणा के बाद फिलहाल विराम लग गया है। इसी के साथ अखिलेश यादव को अब कहने का मौका मिल गया है।
अखिलेश और जयंत के रिश्तों में तल्खी
हाल के महीनों में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के रिश्तों में तल्खी भी बढ़ी है। अखिलेश ने बिना नाम लिए ‘चवन्नी का रुपया’ बनने के बाद छोड़कर जाने की टिप्पणी की थी।
जयंत चौधरी ने इस टिप्पणी पर पलटवार किया था। उन्होंने इसे जाट समाज के अपमान से जोड़ते हुए प्रतिक्रिया दी थी।















