पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में दो गुट बन जाएं और दोनों खुद को असली पार्टी बताएं, तो चुनाव आयोग नाम और चुनाव चिह्न का फैसला किस आधार पर करता है।
17 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश के तहत ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके आरक्षित ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। आयोग ने ममता बनर्जी और दूसरे गुट को आगामी उपचुनावों के लिए अलग नाम और चुनाव चिह्न चुनने को कहा है। यह व्यवस्था फिलहाल अंतरिम है और अंतिम फैसला बाद की प्रक्रिया के बाद लिया जाएगा।
चुनाव आयोग किस आधार पर करता है फैसला?
चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत चुनाव आयोग को उस स्थिति में फैसला करने का अधिकार है, जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विरोधी गुट बन जाएं और दोनों खुद को असली पार्टी बताएं।
ऐसी स्थिति में आयोग उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करता है और संबंधित गुटों के नेताओं तथा अन्य पक्षों को सुनने के बाद यह तय कर सकता है कि इनमें से कौन सा गुट मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है या किसी भी गुट को ऐसा दर्जा नहीं दिया जा सकता।
Election Commission of India — Election Symbols
संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन अहम
ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि पार्टी संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन किस गुट के साथ है। इसके लिए दोनों पक्ष अपने दावों के समर्थन में दस्तावेज और हलफनामे दाखिल करते हैं।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी के मुताबिक, ऐसे विवादों में आयोग ‘रूल ऑफ मेजॉरिटी’ के आधार पर यह देखता है कि किस गुट के पास सांसदों, विधायकों और पार्टी संगठन का अधिक समर्थन है।
संगठनात्मक समर्थन का आकलन करने के लिए पार्टी पदाधिकारियों और उन सदस्यों की जानकारी भी देखी जाती है, जिन्हें पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार होता है। इसके बाद आयोग दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की जांच करता है।
शिवसेना मामले में क्या हुआ था?
शिवसेना में विभाजन के दौरान चुनाव आयोग ने शुरुआत में किसी एक गुट को तुरंत पार्टी का नाम और ‘तीर-कमान’ चुनाव चिह्न नहीं दिया था। पहले मूल नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज किया गया और दोनों गुटों को अलग नाम और चिह्न दिए गए।
बाद में आयोग ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट के पक्ष में फैसला किया। आयोग के सामने शिंदे गुट ने 40 विधायकों और 18 में से 13 सांसदों के समर्थन का दावा और दस्तावेज पेश किए थे। संगठन स्तर पर भी दोनों गुटों से संबंधित हलफनामे और समर्थन के दस्तावेज आयोग के सामने रखे गए थे।
आयोग के फैसले में बहुमत के परीक्षण को आधार बनाया गया था और शिंदे गुट को शिवसेना का नाम तथा ‘तीर-कमान’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया।
TMC मामले में अभी अंतिम फैसला नहीं
तृणमूल कांग्रेस के मामले में अभी चुनाव आयोग का आदेश अंतरिम है। आयोग ने फिलहाल दोनों गुटों को मूल पार्टी नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया है।
आयोग के मुताबिक, रिकॉर्ड पर मौजूद जानकारी से पार्टी में दो विरोधी गुटों की स्थिति सामने आई है और दोनों ही खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं। ऐसे में चुनाव चिह्न आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत आगे की प्रक्रिया के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
आगामी नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा उपचुनावों को देखते हुए दोनों गुटों को नए नाम और चुनाव चिह्न के विकल्प देने को कहा गया है। आयोग इन विकल्पों में से नाम और चिह्न आवंटित करेगा।
LJP विवाद में दोनों गुटों को मिले थे अलग नाम और चिह्न
लोक जनशक्ति पार्टी में रामविलास पासवान के निधन के बाद चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के गुटों के बीच विवाद हुआ था। अक्टूबर 2021 में चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और ‘बंगला’ चुनाव चिह्न फ्रीज कर दिया था।
इसके बाद दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए गए। चिराग पासवान के गुट को लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) नाम और हेलीकॉप्टर चुनाव चिह्न मिला, जबकि पशुपति कुमार पारस के गुट को राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी नाम और सिलाई मशीन चुनाव चिह्न आवंटित किया गया।
चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में 2021 के अंतरिम आदेश के बाद दोनों गुटों को नाम और चिह्न आवंटित किए जाने की जानकारी दर्ज है।
तीनों मामलों में क्या अंतर है?
शिवसेना के मामले में चुनाव आयोग ने विस्तृत प्रक्रिया के बाद एक गुट को मूल पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दिया। LJP मामले में दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चिह्न दिए गए। वहीं TMC मामले में फिलहाल आयोग ने केवल अंतरिम व्यवस्था के तहत मूल नाम और चिह्न को फ्रीज किया है।
इसलिए TMC के मामले में अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अंतिम तौर पर पार्टी का नाम और ‘फूल-घास’ चिह्न किस गुट को मिलेगा। अंतिम स्थिति चुनाव आयोग की आगे की प्रक्रिया और उसके निर्णय पर निर्भर करेगी।













