दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने आपराधिक न्याय प्रणाली और गिरफ्तारी से जुड़े मामलों में एक बेहद अहम और स्पष्ट फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 38 के तहत किसी गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार तो मिलता है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पुलिस पूछताछ के प्रत्येक सत्र (Session) के दौरान वकील की लगातार ‘फिजिकल’ मौजूदगी भी अनिवार्य हो।
बता दें, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कानून की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया, “प्रावधान को सीधे तौर पर पढ़ने से यह साफ होता है कि इसके तहत दिया गया अधिकार पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने का है। यह किसी भी तरह से, हर पूछताछ सेशन के दौरान वकील की लगातार फिजिकल मौजूदगी की बात नहीं करता है, फिर चाहे वह देखने या सुनने की दूरी पर ही क्यों न हो।” अदालत के इस स्पष्टीकरण से जांच एजेंसियों और वकीलों के बीच कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर चल रही स्थिति पर स्थिति काफी हद तक साफ हो गई है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पुलिस और जांच एजेंसियों को पूछताछ के दौरान पारदर्शिता बनाए रखने में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर आरोपियों के कानूनी अधिकारों का दायरा भी तय कर दिया गया है। अदालत का यह फैसला देश भर की अदालतों और पुलिस इन्वेस्टिगेशन के लिहाज से एक मील का पत्थर साबित होगा।













