हम रोजाना जिस हवा में सांस लेते हैं, उसका बुरा असर सिर्फ हमारे लंग्स (फेफड़ों) और हार्ट (दिल) तक ही सीमित नहीं है। एक नई और चौंकाने वाली वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि वायु प्रदूषण हमारे दिमाग और याददाश्त को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। खासतौर पर ट्रैफिक, फैक्ट्रियों और जंगलों की आग से निकलने वाले सूक्ष्म प्रदूषक कण (PM2.5) इंसानी दिमाग की कॉग्निटिव फंक्शन यानी सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर कर रहे हैं।
कम प्रदूषण वाले इलाकों में भी दिमाग पर असर, MRI में दिखी क्षति
यह महत्वपूर्ण स्टडी कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा की गई है, जो 13 मई 2026 को प्रसिद्ध ‘जर्नल स्ट्रोक’ में ऑनलाइन पब्लिश हुई है। करीब 7,000 मध्यम आयु वर्ग के लोगों के आंकड़ों और पीएम2.5 व नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) के प्रभाव का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन इलाकों में वायु प्रदूषण का स्तर अधिक था, वहां के लोगों का प्रदर्शन याददाश्त और मानसिक गति से जुड़े टेस्ट में काफी कमजोर रहा। हैरान करने वाली बात यह है कि यह नकारात्मक असर उन क्षेत्रों में भी देखा गया जहां की हवा को अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से ‘साफ’ माना जाता है। रिसर्च के मुताबिक, ट्रैफिक प्रदूषण के संपर्क में रहने वाले लोगों के ब्रेन के एमआरआई (MRI) स्कैन में सूक्ष्म क्षति (माइक्रो डैमेज) के संकेत मिले हैं, और यह प्रभाव पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक स्पष्ट देखा गया है।
दशकों पहले शुरू हो जाता है डिमेंशिया का खतरा
मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर रसेल डी सूजा और अध्ययन की प्रमुख लेखक सैंडी अज़ाब के अनुसार, डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) जैसी गंभीर मानसिक स्थिति अचानक पैदा नहीं होती। यह शरीर में कई दशकों के दौरान धीरे-धीरे विकसित होती है। हवा में मौजूद टॉक्सिक्स बिना किसी स्पष्ट लक्षण के वर्षों पहले ही दिमाग को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं। हालांकि, यह स्टडी सीधे तौर पर यह दावा नहीं करती कि प्रदूषण ही डिमेंशिया का मुख्य कारण है, लेकिन यह उन वैज्ञानिक प्रमाणों को पुख्ता करती है जो बताते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ याददाश्त को सुरक्षित रखने के लिए स्वच्छ हवा कितनी जरूरी है। हाई बीपी और डायबिटीज जैसे जोखिम कारकों को अलग रखने के बाद भी वायु प्रदूषण और दिमागी कमजोरी के बीच सीधा संबंध पाया गया है।














