नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को रेरा (रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि रेरा केवल डिफाल्टर बिल्डरों को सहूलत देने का काम कर रहा है और यह संस्था खरीदारों के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। उन्होंने कहा, “डिफाल्टर बिल्डरों को सुविधा देने के बजाय, इस संस्था को खत्म कर देना चाहिए।” कोर्ट ने रेरा द्वारा किए गए काम को लेकर गहरी निराशा व्यक्त की और कहा कि जिन लोगों के हितों की रक्षा करने के लिए रेरा का गठन किया गया था, वे आज हताश और परेशान हैं।
यह मामला हिमाचल प्रदेश सरकार की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें हिमाचल हाई कोर्ट ने रेरा दफ्तर को शिमला से धर्मशाला शिफ्ट करने पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल इस रोक को हटाया, बल्कि रेरा के पूरे कामकाजी ढांचे की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि कई राज्यों में रेरा रिटायर नौकरशाहों के लिए “पुनर्वास केंद्र” बन गया है, जहां वे बैठे रहते हैं, लेकिन खरीदारों को कोई ठोस नतीजा नहीं मिलता।
नौकरशाहों की नियुक्ति पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने रेरा में रिटायर्ड अधिकारियों की नियुक्ति पर भी कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि रिटायर ब्यूरोक्रेट्स जैसे लोग पालमपुर और धर्मशाला जैसे क्षेत्रों के विकास में कैसे मदद कर सकते हैं, जबकि उन्हें इन क्षेत्रों की तकनीकी बारीकियों का कोई ज्ञान नहीं है।
राज्यों को पुनर्विचार की सलाह
कोर्ट ने सभी राज्यों को यह संदेश दिया कि वे रेरा के गठन के असली मकसद को समझें। कोर्ट ने कहा कि अगर रेरा खरीदारों के हितों की रक्षा नहीं कर सकता, तो इसकी मौजूदगी का कोई अर्थ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि अब रेरा के फैसलों के खिलाफ अपील सुनने का अधिकार जिला जजों को दिया जाए, ताकि आम लोग बार-बार राजधानी के चक्कर न लगाएं।














